भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 465

राजन्! ऐसा जानकर सुस्थिर हो धैर्यका आश्रय लो और उत्साहपूर्वक शत्रुओंका वध करो। अनघ! हमें इस संसारमें जीवित पुरुषोंके लिये ही शोक करना चाहिये। जो स्वर्गमें चला गया है, उसके लिये शोक करना उचित नहीं है॥ १८॥

शोचतो हि महाराज अघमेवाभिवर्धते। तस्माच्छोकं परित्यज्य श्रेयसे प्रयतेद् बुधः॥ १९॥ प्रहर्षमभिमानं च सुखप्राप्तिं च चिन्तयन्। महाराज! शोक करनेसे केवल दुःख ही बढ़ता है। अतः विद्वान् पुरुष उत्कृष्ट हर्ष, अतिशय सम्मान और सुख-प्राप्तिका चिन्तन करते हुए शोकका परित्याग करके अपने कल्याणके लिये ही प्रयत्न करे॥ १९ १/२॥

एतद् बुद्ध्वा बुधाः शोकं न शोकः शोक उच्यते॥ २०॥ यही सब सोच-समझकर ज्ञानवान् पुरुष शोक नहीं करते हैं। शोकको शोक नहीं कहते हैं (उसका अनुभव करनेवाला मन ही शोकरूप होता है)॥ २०॥

एवं विद्वान् समुत्तिष्ठ प्रयतो भव मा शुचः। श्रुतस्ते सम्भवो मृत्योस्तपांस्यनुपमानि च॥ २१॥ राजन्! ऐसा जानकर तुम युद्धके लिये उठो। मन और इन्द्रियोंको संयममें रखो तथा शोक न करो। तुमने मृत्युकी उत्पत्ति और उसकी अनुपम तपस्याका वृत्तान्त सुन लिया है॥ २१॥

सर्वभूतसमत्वं च चञ्चलाश्च विभूतयः। सृञ्जयस्य तु तं पुत्रं मृतं संजीवितं पुनः॥ २२॥ मृत्यु सम्पूर्ण प्राणियोंको समभावसे प्राप्त होती है और धन-ऐश्वर्य चंचल है—यह बात भी जान ली है। सृंजयका पुत्र मरा और पुनः जीवित हुआ, यह कथा भी तुमने सुन ही ली है॥ २२॥

एवं विद्वान् महाराज मा शुचः साधयाम्यहम्। एतावदुक्त्वा भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ २३॥ महाराज! यह सब तुम जानते हो। अतः शोक न करो। अब मैं अपनी साधनामें लग रहा हूँ। ऐसा कहकर भगवान् व्यास वहीं अन्तर्धान हो गये॥ २३॥

वागीशाने भगवति व्यासे व्यभ्रनभःप्रभे। गते मतिमतां श्रेष्ठे समाश्वास्य युधिष्ठिरम्॥ २४॥ पूर्वेषां पार्थिवेन्द्राणां महेन्द्रप्रतिमौजसाम्। न्यायाधिगतवित्तानां तां श्रुत्वा यज्ञसम्पदम्॥ २५॥ सम्पूज्य मनसा विद्वान् विशोकोऽभूद् युधिष्ठिरः। पुनश्चाचिन्तयद् दीनः किंस्विद् वक्ष्ये धनंजयम्॥ २६॥