महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संजय उवाच
ततः संध्यामुपास्यैव वीरौ वीरावसादने । कथयन्तौ रणे वृत्तं प्रयातौ रथमास्थितौ ॥ ८ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! तदनन्तर वे दोनों वीर उस वीरसंहारक रणभूमिमें संध्या-वन्दन करके पुनः रथपर बैठकर युद्धसम्बन्धी बातें करते हुए आगे बढ़े ॥ ८ ॥
ततः स्वशिविरं प्राप्तौ हतानन्दं हतत्विषम् । वासुदेवोऽर्जुनश्चैव कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ ९ ॥ फिर श्रीकृष्ण और अर्जुन जो अत्यन्त दुष्कर कर्म करके आ रहे थे, अपने शिविरके निकट आ पहुँचे। उस समय वह शिविर आनन्दशून्य और श्रीहीन दिखायी देता था ॥ ९ ॥
ध्वस्ताकारं समालक्ष्य शिविरं परवीरहा । बीभत्सुरब्रवीत् कृष्णमस्वस्थहृदयस्ततः ॥ १० ॥ अपनी छावनीको विध्वस्त हुई-सी देखकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनका हृदय चिन्तित हो उठा। अतः वे भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले— ॥ १० ॥
नदन्ति नाद्य तूर्याणि मङ्गल्यानि जनार्दन । मिश्रा दुन्दुभिनिर्घोषैः शङ्खाश्चाडम्बरैः सह ॥ ११ ॥ ‘जनार्दन! आज इस शिविरमें मांगलिक बाजे नहीं बज रहे हैं। दुन्दुभिनाद तथा तुरहीके शब्दोंके साथ मिली हुई शंखध्वनि भी नहीं सुनायी देती है ॥ ११ ॥
वीणा नैवाद्य वाद्यन्ते शम्यातालस्वनैः सह । मङ्गल्यानि च गीतानि न गायन्ति पठन्ति च ॥ १२ ॥ स्तुतियुक्तानि रम्याणि ममानीकेषु बन्दिनः । ‘ढाक और करतारकी ध्वनिके साथ आज वीणा भी नहीं बज रही है। मेरी सेनाओंमें वन्दीजन न तो मंगलगीत गा रहे हैं और न स्तुतियुक्त मनोहर श्लोकोंका ही पाठ करते हैं ॥ १२१/२ ॥
योधाश्चापि हि मां दृष्ट्वा निवर्तन्ते ह्यधोमुखाः ॥ १३ ॥ कर्माणि च यथापूर्वं कृत्वा नाभिवदन्ति माम् । अपि स्वस्ति भवेदद्य भ्रातृभ्यो मम माधव ॥ १४ ॥ ‘मेरे सैनिक मुझे देखकर नीचे मुख किये लौट जाते हैं। पहलेकी भाँति अभिवादन करके मुझसे युद्धका समाचार नहीं बता रहे हैं। माधव! क्या आज मेरे भाई सकुशल होंगे?’ ॥ १३-१४ ॥
न हि शुद्ध्यति मे भावो दृष्ट्वा स्वजनमाकुलम् । अपि पाञ्चालराजस्य विराटस्य च मानद ॥ १५ ॥