भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 483

इसके पहले उसने हजारों हाथी, रथ, घोड़े और मनुष्योंको मार डाला था। आठ हजार रथों और नौ सौ हाथियोंका संहार किया था। दो हजार राजकुमारों तथा और भी बहुत-से अलक्षित वीरोंका वध करके राजा बृहद्दलको भी युद्धस्थलमें स्वर्गलोकका अतिथि बनाया। इसके बाद परम धर्मात्मा अभिमन्यु स्वयं मृत्युको प्राप्त हुआ ।। १३-१४ १/२ ।। (गतःसुकृतिनां लोकान् ये च स्वर्गजितां शुभाः । अदीनस्त्रासयञ्छत्रून् नन्दयित्वा च बान्धवान् ।। असकृन्नाम विश्राव्य पितॄणां मातुलस्य च । वीरो दिष्टान्तमापन्नः शोचयन् बान्धवान् बहून् ।। ततः स्म शोकसंतप्ता भवताद्य समेयुषः ।) वह पुण्यात्माओंके लोकोंमें गया है। अपने पुण्यके बलसे स्वर्गलोकपर विजय पानेवाले धर्मात्मा पुरुषोंको जो शुभ लोक सुलभ होते हैं, वे ही उसे भी प्राप्त हुए हैं। उसने कभी युद्धमें दीनता नहीं दिखायी। वह वीर शत्रुओंको त्रास और बान्धवोंको आनन्द प्रदान करता हुआ अपने पितरों और मामाके नामको बारंबार विख्यात करके अपने बहुसंख्यक बन्धुओंको शोकमें डालकर मृत्युको प्राप्त हुआ है। तभीसे हमलोग शोकसे संतप्त हैं और इस समय तुमसे हमारी भेंट हुई है। एतावदेव निर्वृत्तमस्माकं शोकवर्धनम् ।। १५ ।। स चैवं पुरुषव्याघ्रः स्वर्गलोकमवाप्तवान् । यही हमलोगोंके लिये शोक बढ़ानेवाली घटना घटित हुई है। पुरुषसिंह अभिमन्यु इस प्रकार स्वर्गलोकमें गया है ।। १५ १/२ ।। ततोऽर्जुनो वचः श्रुत्वा धर्मराजेन भाषितम् ।। १६ ।। हा पुत्र इति निःश्वस्य व्यथितो न्यपतद् भुवि । धर्मराज युधिष्ठिरकी कही हुई यह बात सुनकर अर्जुन व्यथासे पीड़ित हो लंबी साँस खींचते हुए ‘हा पुत्र’ कहकर पृथ्वीपर गिर पड़े ।। १६ १/२ ।। विषण्णवदनाः सर्वे परिवार्य धनंजयम् ।। १७ ।। नेत्रैरनिमिषैर्दीनाः प्रत्यवैक्षन् परस्परम् । उस समय सबके मुखपर विषाद छा गया। सब लोग अर्जुनको घेरकर दुःखी हो एकटक नेत्रोंसे एक-दूसरेकी ओर देखने लगे ।। १७ १/२ ।। प्रतिलभ्य ततः संज्ञां वासविः क्रोधमूर्च्छितः ।। १८ ।। कम्पमानो ज्वरेणेव निःश्वसंश्च मुहुर्मुहुः । पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य श्वसमानोऽश्रुनेत्रवान् ।। १९ ।। उन्मत्त इव विप्रेक्षन्निदं वचनमब्रवीत् ।