भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 493

न भेतव्यं नरव्याघ्र को हि त्वां पुरुषर्षभ । मध्ये क्षत्रियवीराणां तिष्ठन्तं प्रार्थयेद् युधि ॥ १४ ॥ ‘पुरुषसिंह! नरश्रेष्ठ! तुम्हें भय नहीं करना चाहिये। युद्धस्थलमें इन क्षत्रिय वीरोंके बीचमें खड़े रहनेपर कौन तुम्हें मारनेकी इच्छा कर सकता है? ॥ १४ ॥ अहं वैकर्तनः कर्णश्चित्रसेनो विविंशतिः । भूरिश्रवाः शलः शल्यो वृषसेनो दुरासदः ॥ १५ ॥ पुरुमित्रो जयो भोजः काम्बोजश्च सुदक्षिणः । सत्यव्रतो महाबाहुर्विकर्णो दुर्मुखश्च ह ॥ १६ ॥ दुःशासनः सुबाहुश्च कालिङ्गश्चाप्युदायुधः । विन्दानुविन्दावावन्त्यौ द्रोणो द्रौणिश्च सौबलः ॥ १७ ॥ एते चान्ये च बहवो नानाजनपदेश्वराः । ससैन्यास्त्वाभियास्यन्ति व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ १८ ॥ ‘मैं, सूर्यपुत्र कर्ण, चित्रसेन, विविंशति, भूरिश्रवा, शल, शल्य, दुर्धर्ष वीर वृषसेन, पुरुमित्र, जय, भोज, काम्बोजराज सुदक्षिण, सत्यव्रत, महाबाहु विकर्ण, दुर्मुख, दुःशासन, सुबाहु, अस्त्र-शस्त्रधारी कलिंगराज, अवन्तीके दोनों राजकुमार विन्द और अनुविन्द, द्रोण, अश्वत्थामा और शकुनि—ये तथा और भी बहुत-से नरेश जो विभिन्न देशोंके अधिपति हैं, अपनी सेनाके साथ तुम्हारी रक्षाके लिये चलेंगे। अतः तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ १५—१८ ॥ त्वं चापि रथिनां श्रेष्ठः स्वयं शूरोऽमितद्युते । स कथं पाण्डवेयेभ्यो भयं पश्यसि सैन्धव ॥ १९ ॥