भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 495

व्यूहयिष्यामि तं व्यूहं यं पार्थो न तरिष्यति ॥ २७ ॥ वत्स! तो भी तुम्हें युद्धमें किसी प्रकार भी अर्जुनसे डरना नहीं चाहिये; क्योंकि मैं उनके भयसे तुम्हारी रक्षा करनेवाला हूँ—इसमें संशय नहीं है। मेरी भुजाएँ जिसकी रक्षा करती हों, उसपर देवताओंका भी जोर नहीं चल सकता। मैं ऐसा व्यूह बनाऊँगा, जिसे अर्जुन पार नहीं कर सकेंगे ॥ २६-२७ ॥ तस्माद् युध्यस्व मा भैस्त्वं स्वधर्ममनुपालय । पितृपैतामहं मार्गमनुयाहि महारथ ॥ २८ ॥ इसलिये तुम डरो मत। उत्साहपूर्वक युद्ध करो और अपने क्षत्रिय-धर्मका पालन करो। महारथी वीर! अपने बाप-दादोंके मार्गपर चलो ॥ २८ ॥ अधीत्य विधिवद् वेदानग्नयः सुहुतास्त्वया । इष्टं च बहुभिर्यज्ञैर्न ते मृत्युर्भयङ्करः ॥ २९ ॥ तुमने वेदोंका विधिपूर्वक अध्ययन करके भलीभाँति अग्निहोत्र किया है। बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान भी कर लिया है। तुम्हें तो मृत्युका भय करना ही नहीं चाहिये ॥ दुर्लभं मानुषैर्मन्दैर्महाभाग्यमवाप्य तु । भुजवीर्यार्जिताँल्लोकान् दिव्यान् प्राप्स्यस्यनुत्तमान् ॥ ३० ॥ जो मन्दभागी मनुष्योंके लिये दुर्लभ है, रणक्षेत्रमें मृत्युरूप उस परम सौभाग्यको पाकर तुम अपने बाहुबलसे जीते हुए परम उत्तम दिव्य लोकोंमें पहुँच जाओगे ॥ ३० ॥ कुरवः पाण्डवाश्चैव वृष्णयोऽन्ये च मानवाः । अहं च सह पुत्रेण अध्रुवा इति चिन्त्यताम् ॥ ३१ ॥ कौरव-पाण्डव, वृष्णिवंशी योद्धा, अन्य मनुष्य तथा पुत्रसहित मैं—ये सभी अस्थिर (नाशवान्) हैं—ऐसा चिन्तन करो ॥ ३१ ॥ पर्यायेण वयं सर्वे कालेन बलिना हताः । परलोकं गमिष्यामः स्वैः स्वैः कर्मभिरन्विताः ॥ ३२ ॥ बारी-बारीसे हम सभी लोग बलवान् कालके हाथों मारे जाकर अपने-अपने शुभाशुभ कर्मोंके साथ परलोकमें चले जायँगे ॥ ३२ ॥ तपस्तप्त्वा तु याँल्लोकान् प्राप्नुवन्ति तपस्विनः । क्षत्रधर्माश्रिता वीराः क्षत्रियाः प्राप्नुवन्ति तान् ॥ ३३ ॥ तपस्वीलोग तपस्या करके जिन लोकोंको पाते हैं, क्षत्रिय-धर्मका आश्रय लेनेवाले वीर क्षत्रिय उन्हें अनायास ही प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३३ ॥ एवमाश्वासितो राजा भारद्वाजेन सैन्धवः । अपानुदद् भयं पार्थाद् युद्धाय च मनो दधे ॥ ३४ ॥ द्रोणाचार्यके इस प्रकार आश्वासन देनेपर राजा जयद्रथने अर्जुनका भय छोड़ दिया और युद्ध करनेका विचार किया ॥ ३४ ॥

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