महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ
पृष्ठ 50, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 50
सदाप्रमत्तः समरे किरीटिनम्।
तथापि हन्तास्मि समेत्य संख्ये
यास्यामि वा भीष्मपथा यमाय ॥ ३२ ॥
‘तथापि मैं समरभूमिमें सावधान रहकर युद्ध करूँगा और यदि सबका संहार करनेवाली मृत्यु स्वयं आकर अर्जुनकी रक्षा करे तो भी मैं युद्धके मैदानमें उनका सामना करके उन्हें मार डालूँगा अथवा स्वयं ही भीष्मके मार्गसे यमराजका दर्शन करनेके लिये चला जाऊँगा ॥ ३२ ॥