भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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वस्तुओंको घरमें बाँटकर उपयोगमें लेनेवाले तथा चुगलीसे दूर रहनेवाले लोगोंको जो गति प्राप्त होती है, वही गति तुम्हें भी मिले ।। २७-२८ ।। व्रतिनां धर्मशीलानां गुरुशुश्रूषिणामपि । अमोघातिथीनां या च तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ २९ ॥ 'वत्स! व्रतपरायण, धर्मशील, गुरुसेवक एवं अतिथिको निराश न लौटानेवाले लोगोंको जिस गतिकी प्राप्ति होती है, वह तुम्हें भी प्राप्त हो ।। २९ ।। कृच्छ्रेषु या धारयतामात्मानं व्यसनेषु च । गतिः शोकाग्निदग्धानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ ३० ॥ 'बेटा! जो लोग भारी-से-भारी कठिनाइयोंमें और संकटोंमें पड़नेपर तथा शोकाग्निसे दग्ध होनेपर भी धैर्य धारण करके अपने-आपको स्थिर रखते हैं, उन्हें मिलनेवाली गतिको तुम भी प्राप्त करो ।। ३० ।। मातापित्रोश्च शुश्रूषां कल्पयन्तीह ये सदा । स्वदारनिरतानां च या गतिस्तामवाप्नुहि ॥ ३१ ॥ 'जो सदा इस जगत्में माता-पिताकी सेवा करते हैं और अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखते हैं, उनकी जैसी गति होती है, वही तुम्हें भी प्राप्त हो ।। ३१ ।। ऋतुकाले स्वकां भार्यां गच्छतां या मनीषिणाम् । परस्त्रीभ्यो निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ ३२ ॥ 'पुत्र! ऋतुकालमें अपनी स्त्रीसे सहवास करते हुए परायी स्त्रियोंसे सदा दूर रहनेवाले मनीषी पुरुषोंको जो गति प्राप्त होती है, वही तुम्हें भी मिले ।। ३२ ।। साम्ना ये सर्वभूतानि पश्यन्ति गतमत्सराः । नारुंतुदानां क्षमिणां या गतिस्तामवाप्नुहि ॥ ३३ ॥ 'जो ईर्ष्या-द्वेषसे दूर रहकर समस्त प्राणियोंको समभावसे देखते हैं तथा जो किसीके मर्मस्थानको वाणीद्वारा चोट नहीं पहुँचाते एवं सबके प्रति क्षमाभाव रखते हैं, उनकी जो गति होती है, उसीको तुम भी प्राप्त करो ।। ३३ ।। मधुमांसनिवृत्तानां मदाद् दम्भात् तथानृतात् । परोपतापत्यक्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ ३४ ॥ 'पुत्र! जो मद्य और मांसका सेवन नहीं करते, मद, दम्भ और असत्यसे अलग रहते और दूसरोंको संताप नहीं देते हैं, उन्हें मिलनेवाली सद्गति तुम्हें भी प्राप्त हो ।। ३४ ।। ह्रीमन्तः सर्वशास्त्रज्ञा ज्ञानतृप्ता जितेन्द्रियाः । यां गतिं साधवो यान्ति तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ ३५ ॥ 'बेटा! सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता, लज्जाशील, ज्ञानसे परितृप्त, जितेन्द्रिय श्रेष्ठपुरुष जिस गतिको पाते हैं, उसीको तुम भी प्राप्त करो' ।। ३५ ।। एवं विलपतीं दीनां सुभद्रां शोककर्शिताम् ।

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