महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 529, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंथीं ।। ३० ।। स्निग्धाञ्जनचयाकारं सम्प्राप्तः कालपर्वतम् । ब्रह्मतुङ्गं नदीश्चान्यास्तथा जनपदानपि ।। ३१ ।। वे क्रमशः आगे बढ़ते हुए स्निग्ध कज्जलराशिके समान आकारवाले काल पर्वतके समीप जा पहुँचे। फिर ब्रह्मतुंग पर्वत, अन्यान्य नदियों तथा बहुत-से जनपदोंको भी उन्होंने देखा ।। ३१ ।।
स तुङ्गं शतशृङ्गं च शर्यातिवनमेव च । पुण्यमश्वशिरःस्थानं स्थानमाथर्वणस्य च ।। ३२ ।। वृषदंशं च शैलेन्द्रं महामन्दरमेव च । अप्सरोभिः समाकीर्णं किन्नरैश्चोपशोभितम् ।। ३३ ।। तदनन्तर क्रमशः उच्चतम शतशृंग, शर्यातिवन, पवित्र अश्वशिरःस्थान, आथर्वण मुनिका स्थान और गिरिराज वृषदंशका अवलोकन करते हुए वे महा-मन्दराचलपर जा पहुँचे, जो अप्सराओंसे व्याप्त और किन्नरोंसे सुशोभित था ।। ३२-३३ ।।
तस्मिन् शैले व्रजन् पार्थः सकृष्णः समवैक्षत । शुभैः प्रस्रवणैर्जुष्टां हेमधातुविभूषिताम् ।। ३४ ।। चन्द्ररश्मिप्रकाशाङ्गीं पृथिवीं पुरमालिनीम् । उस पर्वतके ऊपरसे जाते हुए श्रीकृष्णसहित अर्जुनने नीचे देखा कि नगरों एवं गाँवोंके समुदायसे सुशोभित, सुवर्णमय धातुओंसे विभूषित तथा सुन्दर झरनोंसे युक्त पृथ्वीके सम्पूर्ण अंग चन्द्रमाकी किरणोंसे प्रकाशित हो रहे हैं ।। ३४ १/२ ।।
समुद्रांश्चाद्भुताकारानपश्यद् बहुलाकरान् ।। ३५ ।। वियद् द्यां पृथिवीं चैव तथा विष्णुपदं व्रजन् । विस्मितः सह कृष्णेन क्षिप्तो बाण इवाभ्यगात् ।। ३६ ।। बहुत-से रत्नोंकी खानोंसे युक्त समुद्र भी अद्भुत आकारमें दृष्टिगोचर हो रहे थे। इस प्रकार पृथ्वी, अन्तरिक्ष और आकाशका एक साथ दर्शन करके आश्चर्यचकित हुए अर्जुन श्रीकृष्णके साथ विष्णुपद (उच्चतम आकाश)-में यात्रा करने लगे। वे धनुषसे चलाये हुए बाणके समान आगे बढ़ रहे थे ।। ३५-३६ ।।
ग्रहनक्षत्रसोमानां सूर्याग्न्योश्च समत्विषम् । अपश्यत तदा पार्थो ज्वलन्तमिव पर्वतम् ।। ३७ ।। तदनन्तर कुन्तीकुमार अर्जुनने एक पर्वतको देखा, जो अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था। ग्रह, नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य और अग्निके समान उसकी प्रभा सब ओर फैल रही थी ।। ३७ ।।
समासाद्य तु तं शैलं शैलाग्रे समवस्थितम् । तपोनित्यं महात्मानमपश्यद् वृषभध्वजम् ।। ३८ ।।