महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 532, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्तूयमानं स्तवैर्दिव्यैर्ऋषिभिर्ब्रह्मवादिभिः । गोप्तारं सर्वभूतानामिष्वासधरमच्युतम् ॥ ४२ ॥ ब्रह्मवादी महर्षिगण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति कर रहे थे। अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले वे समस्त प्राणियोंके रक्षक भगवान् शिव धनुष धारण किये हुए (अद्भुत शोभा पा रहे) थे ॥ ४२ ॥
वासुदेवस्तु तं दृष्ट्वा जगाम शिरसा क्षितिम् । पार्थेन सह धर्मात्मा गृणन् ब्रह्म सनातनम् ॥ ४३ ॥ अर्जुनसहित धर्मात्मा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने उन्हें देखते ही वहाँकी पृथ्वीपर माथा टेककर प्रणाम किया और उन सनातन ब्रह्मस्वरूप भगवान् शिवकी स्तुति करने लगे ॥ ४३ ॥
लोकादिं विश्वकर्माणमजमीशानमव्ययम् । मनसः परमं योनिं खं वायुं ज्योतिषां निधिम् ॥ ४४ ॥ स्रष्टारं वारिधाराणां भुवश्च प्रकृतिं पराम् । देवदानवयक्षाणां मानवानां च साधनम् ॥ ४५ ॥ योगानां च परं धाम दृष्टं ब्रह्मविदां निधिम् । चराचरस्य स्रष्टारं प्रतिहर्त्तारमेव च ॥ ४६ ॥ कालकोपं महात्मानं शक्रसूर्यगुणोदयम् । ववन्दे तं तदा कृष्णो वाङ्मनोबुद्धिकर्मभिः ॥ ४७ ॥ वे जगत्के आदि कारण, लोकस्रष्टा, अजन्मा, ईश्वर, अविनाशी, मनकी उत्पत्तिके प्रधान कारण, आकाश एवं वायुस्वरूप, तेजके आश्रय, जलकी सृष्टि करनेवाले, पृथ्वीके भी परम कारण, देवताओं, दानवों, यक्षों तथा मनुष्योंके भी प्रधान कारण, सम्पूर्ण योगोंके परम आश्रय, ब्रह्मवेत्ताओंकी प्रत्यक्ष निधि, चराचर जगत्की सृष्टि और संहार करनेवाले तथा इन्द्रके ऐश्वर्य आदि और सूर्यदेवके प्रताप आदि गुणोंको प्रकट करनेवाले परमात्मा थे। उनके क्रोधमें कालका निवास था। उस समय भगवान् श्रीकृष्णने मन, वाणी, बुद्धि और क्रियाओंद्वारा उनकी वन्दना की ॥ ४४—४७ ॥
यं प्रपद्यन्ति विद्वांसः सूक्ष्माध्यात्मपदैषिणः । तमजं कारणात्मानं जग्मतुः शरणं भवम् ॥ ४८ ॥ सूक्ष्म अध्यात्मपदकी अभिलाषा रखनेवाले विद्वान् जिनकी शरण लेते हैं, उन्हीं कारणस्वरूप अजन्मा भगवान् शिवकी शरणमें श्रीकृष्ण और अर्जुन भी गये ॥ ४८ ॥
अर्जुनश्चापि तं देवं भूयो भूयोऽप्यवन्दत । ज्ञात्वा तं सर्वभूतादिं भूतभव्यभवोद्भवम् ॥ ४९ ॥ अर्जुनने भी उन्हें समस्त भूतोंका आदि कारण और भूत, भविष्य एवं वर्तमान जगत्का उत्पादक जानकर बारंबार उन महादेवजीके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ४९ ॥