महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्थितौ तत्सरो दिव्यं दिव्यैश्वर्यशतैर्युतम् ।। ८ ।। निर्दिष्टं यद् वृषाङ्केन पुण्यं सर्वार्थसाधकम् । तौ जग्मतुरसम्भ्रान्तौ नरनारायणावृषी ।। ९ ।। तब 'बहुत अच्छा' कहकर वे दोनों वीर भगवान् शंकरके पार्षदगणोंके साथ सैकड़ों दिव्य ऐश्वर्योंसे सम्पन्न तथा सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाले उस पुण्यमय दिव्य सरोवरकी ओर प्रस्थित हुए, जिसकी ओर जानेके लिये महादेवजीने स्वयं ही संकेत किया था। वे दोनों नर-नारायण ऋषि बिना किसी घबराहटके वहाँ जा पहुँचे ।।
ततस्तौ तत् सरो गत्वा सूर्यमण्डलसंनिभम् । नागमन्तर्जले घोरं ददृशातेऽर्जुनाच्युतौ ।। १० ।। उस सरोवरके तटपर पहुँचकर अर्जुन और श्रीकृष्ण दोनोंने जलके भीतर एक भयंकर नाग देखा, जो सूर्यमण्डलके समान प्रकाशित हो रहा था ।। १० ।।
द्वितीयं चापरं नागं सहस्रशिरसं वरम् । वमन्तं विपुला ज्वाला ददृशातेऽग्निवर्चसम् ।। ११ ।। वहीं उन्होंने अग्निके समान तेजस्वी और सहस्र फणोंसे युक्त दूसरा श्रेष्ठ नाग भी देखा, जो अपने मुखसे आगकी प्रचण्ड ज्वालाएँ उगल रहा था ।। ११ ।।
ततः कृष्णश्च पार्थश्च संस्पृश्याम्भः कृताञ्जली । तौ नागावुपतस्थाते नमस्यन्तौ वृषध्वजम् ।। १२ ।। तब श्रीकृष्ण और अर्जुन जलसे आचमन करके हाथ जोड़ भगवान् शंकरको प्रणाम करते हुए उन दोनों नागोंके निकट खड़े हो गये ।। १२ ।।
गृणन्तौ वेदविद्वांसौ तद् ब्रह्म शतरुद्रियम् । अप्रमेयं प्रणमतो गत्वा सर्वात्मना भवम् ।। १३ ।। वे दोनों ही वेदोंके विद्वान् थे। अतः उन्होंने शतरुद्री मन्त्रोंका पाठ करते हुए साक्षात् ब्रह्मस्वरूप अप्रमेय शिवकी सब प्रकारसे शरण लेकर उन्हें प्रणाम किया ।। १३ ।।
ततस्तौ रुद्रमाहात्म्याद्धित्वा रूपं महोरगौ । धनुर्बाणश्च शत्रुघ्नं तद् द्वन्द्वं समपद्यत ।। १४ ।। तदनन्तर भगवान् शंकरकी महिमासे वे दोनों महानाग अपने उस रूपको छोड़कर दो शत्रुनाशक धनुष-बाणके रूपमें परिणत हो गये ।। १४ ।।
तौ तज्जगृहतुः प्रीतौ धनुर्बाणं च सुप्रभम् । आजहतुर्महात्मानौ ददतुश्च महात्मने ।। १५ ।। उस समय अत्यन्त प्रसन्न होकर महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुनने उस प्रकाशमान धनुष और बाणको हाथमें ले लिया। फिर वे उन्हें महादेवजीके पास ले आये और उन्हीं महात्माके हाथोंमें अर्पित कर दिया ।। १५ ।।
ततः पार्श्वाद् वृषाङ्कस्य ब्रह्मचारी न्यवर्तत ।