महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 539, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंवरमारण्यके दत्तं दर्शनं शङ्करस्य च ।। २० ।।
मनसा चिन्तयामास तन्मे सम्पद्यतामिति ।
तब स्मरणशक्तिसे सम्पन्न अर्जुनने भगवान् शंकरको अत्यन्त प्रसन्न जानकर वनवासके समय जो भगवान् शंकरका दर्शन और वरदान प्राप्त हुआ था, उसका मन-ही-मन चिन्तन किया और यह इच्छा की कि मेरा वह मनोरथ पूर्ण हो ।। २० १/२ ।।
तस्य तन्मतमाज्ञाय प्रीतः प्रादाद् वरं भवः ।। २१ ।।
तच्च पाशुपतं घोरं प्रतिज्ञायाश्च पारणम् ।
उनके इस अभिप्रायको जानकर भगवान् शंकरने प्रसन्न हो वरदानके रूपमें वह घोर पाशुपत अस्त्र, जो उनकी प्रतिज्ञाकी पूर्ति करानेवाला था, दे दिया ।। २१ १/२ ।।
ततः पाशुपतं दिव्यमवाप्य पुनरीश्वरात् ।। २२ ।।
संहृष्टरोमा दुर्धर्षः कृतं कार्यममन्यत ।
भगवान् शंकरसे उस दिव्य पाशुपतास्त्रको पुनः प्राप्त करके दुर्धर्ष वीर अर्जुनके शरीरमें रोमांच हो आया और उन्हें यह विश्वास हो गया कि अब मेरा कार्य पूर्ण हो जायगा ।। २२ १/२ ।।
ववन्दतुश्च संहृष्टौ शिरोभ्यां तं महेश्वरम् ।। २३ ।।
अनुज्ञातौ क्षणे तस्मिन् भवेनार्जुनकेशवौ ।
प्राप्तौ स्वशिविरं वीरौ मुदा परमया युतौ ।। २४ ।।
फिर तो अत्यन्त हर्षमें भरे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों महापुरुषोंने मस्तक नवाकर भगवान् महेश्वरको प्रणाम किया और उनकी आज्ञा ले उसी क्षण वे दोनों वीर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने शिविरको लौट आये ।। २३-२४ ।।
तथा भवेनानुमतौ महासुरनिघातिना ।
इन्द्राविष्णू यथा प्रीतौ जम्भस्य वधकाङ्क्षिणौ ।। २५ ।।
जैसे पूर्वकालमें जम्भासुरके वधकी इच्छा रखनेवाले इन्द्र और विष्णु महासुरविनाशक भगवान् शंकरकी अनुमति पाकर प्रसन्नतापूर्वक लौटे थे, उसी प्रकार श्रीकृष्ण और अर्जुन भी आनन्दित होकर अपने शिविरमें आये ।। २५ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि अर्जुनस्य पुनः पाशुपतास्त्रप्राप्तौ
एकाशीतितमोऽध्यायः ।। ८१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें अर्जुनको पुनः पाशुपतास्त्रकी प्राप्तिविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८१ ।।