महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 560, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंएतेषां मतमादाय यदि वर्तेत पुत्रकः । सज्ञातिमित्रः ससुहृच्चिरं जीवेदनामयः ॥ २९ ॥ यदि बेटा दुर्योधन इन सबकी राय लेकर चलता तो भाई-बन्धु, मित्र और सुहृदोंसहित दीर्घकालतक नीरोग एवं स्वस्थ रहकर जीवन धारण करता ॥ २९ ॥
श्लक्ष्णा मधुरसम्भाषा ज्ञातिबन्धुप्रियंवदाः । कुलीनाः सम्मताः प्राज्ञाः सुखं प्राप्स्यन्ति पाण्डवाः ॥ ३० ॥ ‘पाण्डव सरल, मधुरभाषी, भाई-बन्धुओंके प्रति प्रिय वचन बोलनेवाले, कुलीन, सम्मानित और विद्वान् हैं; अतः उन्हें सुखकी प्राप्ति होगी ॥ ३० ॥
धर्मापेक्षी नरो नित्यं सर्वत्र लभते सुखम् । प्रेत्यभावे च कल्याणं प्रसादं प्रतिपद्यते ॥ ३१ ॥ ‘धर्मकी अपेक्षा रखनेवाला मनुष्य सदा सर्वत्र सुखका भागी होता है। मृत्युके पश्चात् भी उसे कल्याण एवं प्रसन्नता प्राप्त होती है ॥ ३१ ॥
अर्हास्ते पृथिवीं भोक्तुं समर्थाः साधनेऽपि च । तेषामपि समुद्रान्ता पितृपैतामही मही ॥ ३२ ॥ ‘पाण्डव पृथ्वीका राज्य भोगनेमें और उसे प्राप्त करनेमें भी समर्थ हैं। यह समुद्रपर्यन्त पृथ्वी उनके बाप-दादोंकी भी है ॥ ३२ ॥
नियुज्यमानाः स्थास्यन्ति पाण्डवा धर्मवर्त्मनि । सन्ति मे ज्ञातयस्तात येषां श्रोष्यन्ति पाण्डवाः ॥ ३३ ॥ ‘तात! पाण्डवोंको यदि आदेश दिया जाय तो वे उसे मानकर सदा धर्ममार्गपर ही स्थिर रहेंगे। मेरे अनेक ऐसे भाई-बन्धु हैं, जिनकी बात पाण्डव सुनेंगे ॥ ३३ ॥
शल्यस्य सोमदत्तस्य भीष्मस्य च महात्मनः । द्रोणस्याथ विकर्णस्य बाह्लीकस्य कृपस्य च ॥ ३४ ॥ अन्येषां चैव वृद्धानां भरतानां महात्मनाम् । त्वदर्थं ब्रुवतां तात करिष्यन्ति वचो हि ते ॥ ३५ ॥ ‘वत्स! शल्य, सोमदत्त, महात्मा भीष्म, द्रोणाचार्य, विकर्ण, बाह्लीक, कृपाचार्य तथा अन्य जो बड़े-बूढ़े महामना भरतवंशी हैं, वे यदि तुम्हारे लिये उनसे कुछ कहेंगे तो पाण्डव उनकी बात अवश्य मानेंगे ॥ ३४-३५ ॥
कं वा त्वं मन्यसे तेषां यस्तान् ब्रूयादतोऽन्यथा । कृष्णो न धर्मं संजह्यात् सर्वे ते हि तदन्वयाः ॥ ३६ ॥ ‘बेटा दुर्योधन! तुम उपर्युक्त व्यक्तियोंमेंसे किसको ऐसा मानते हो जो पाण्डवोंके विषयमें इसके विपरीत कह सके। श्रीकृष्ण कभी धर्मका परित्याग नहीं कर सकते और समस्त पाण्डव उन्हींके मार्गका अनुसरण करनेवाले हैं ॥ ३६ ॥
मयापि चोक्तास्ते वीरा वचनं धर्मसंहितम् ।