भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 562

हतौ हि पुरुषव्याघ्रौ भीष्मद्रोणौ त्वमात्थ वै ।
संजय! यह दुर्योधन मेरे उन विलापोंको कभी याद नहीं करेगा। तुम कहते हो कि 'पुरुषसिंह भीष्म और द्रोणाचार्य मारे गये' ।। ४५ १/२ ।।
तेषां विदुरवाक्यानामुक्तानां दीर्घदर्शनात् ।। ४६ ।।
दृष्ट्वेमां फलनिर्वृत्तिं मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।
सेनां दृष्ट्वाभिभूतां मे शैनेयेनार्जुनेन च ।। ४७ ।।
विदुरने भविष्यमें होनेवाली दूरतककी घटनाओंको ध्यानमें रखकर जो बातें कही थीं, उन्हींके अनुसार इस समय हमें यह फल मिल रहा है। इसे देखकर मैं यह समझता हूँ कि मेरे पुत्र सात्यकि और अर्जुनके द्वारा अपनी सेनाका संहार देखते हुए शोक कर रहे होंगे ।। ४६-४७ ।।
शून्यान् दृष्ट्वा रथोपस्थान् मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।
हिमात्यये यथा कक्षं शुष्कं वातेरितो महान् ।। ४८ ।।
अग्निर्दहेत् तथा सेनां मामिकां स धनंजयः ।
आचक्ष्व मम तत् सर्वं कुशलो ह्यसि संजयः ।। ४९ ।।
बहुत-से रथोंकी बैठकोंको रथियोंसे शून्य देखकर मेरे पुत्र शोकमें डूब गये होंगे; ऐसा मेरा विश्वास है। जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें वायुका सहारा पाकर बढ़ी हुई अग्नि सूखे घासको जला डालती है, उसी प्रकार अर्जुन मेरी सेनाको दग्ध कर डालेंगे। संजय! तुम कथा कहनेमें कुशल हो; अतः युद्धका सारा समाचार मुझसे कहो ।। ४८-४९ ।।
यदुपयात सायाह्ने कृत्वा पार्थस्य किल्बिषम् ।
अभिमन्यौ हते तात कथमासीन्मनो हि वः ।। ५० ।।
तात! जब तुमलोग अभिमन्युके मारे जानेपर अर्जुनका महान् अपराध करके सायंकालमें शिविरको लौटे थे, उस समय तुम्हारे मनकी क्या अवस्था थी? ।। ५० ।।
न जातु तस्य कर्माणि युधि गाण्डीवधन्वनः ।
अपकृत्य महत् तात सोढुं शक्ष्यन्ति मामकाः ।। ५१ ।।
तात! गाण्डीवधारी अर्जुनका महान् अपकार करके मेरे पुत्र युद्धमें उनके पराक्रमको कभी नहीं सह सकेंगे ।।
किन्नु दुर्योधनः कृत्यं कर्णः कृत्यं किमब्रवीत् ।
दुःशासनः सौबलश्च तेषामेवं गतेष्वपि ।। ५२ ।।
उस समय उनकी ऐसी अवस्था होनेपर भी दुर्योधनने कौन-सा कर्तव्य निश्चित किया? कर्ण, दुःशासन तथा शकुनिने क्या करनेकी सलाह दी? ।। ५२ ।।
सर्वेषां समवेतानां पुत्राणां मम संजय ।
यद् वृत्तं तात संग्रामे मन्दस्यापनयैर्भृशम् ।। ५३ ।।
लोभानुगस्य दुर्बुद्धेः क्रोधेन विकृतात्मनः ।