महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 566, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंलिया ।। १४ ।। पाण्डुना निर्जितं राज्यं कौरवाणां यशस्तथा । ततश्चाप्यधिकं भूयः पाण्डवैर्धर्मचारिभिः ।। १५ ।। राजा पाण्डुने भूमण्डलका राज्य जीता और कौरवोंके यशका विस्तार किया था। फिर धर्मपरायण पाण्डवोंने अपने पितासे भी बढ़-चढ़कर राज्य और सुयशका प्रसार किया है ।। १५ ।।
तेषां तत् तादृशं कर्म त्वामासाद्य सुनिष्फलम् । यत् पित्र्याद् भ्रंशिता राज्यात् त्वयेहामिषगृद्धिना ।। १६ ।। परंतु उनका वैसा महान् कर्म भी आपको पाकर अत्यन्त निष्फल हो गया; क्योंकि आपने राज्यके लोभमें पड़कर उन्हें अपने पैतृक राज्यसे भी वंचित कर दिया ।। १६ ।।
यत् पुनर्युद्धकाले त्वं पुत्रान् गर्हयसे नृप । बहुधा व्याहरन् दोषान् न तदद्योपपद्यते ।। १७ ।। नरेश्वर! आज जब युद्धका अवसर उपस्थित है, ऐसे समयमें जो आप अपने पुत्रोंके नाना प्रकारके दोष बताते हुए उनकी निन्दा कर रहे हैं यह इस समय आपको शोभा नहीं देता है ।। १७ ।।
न हि रक्षन्ति राजानो युध्यन्तो जीवितं रणे । चमूं विगाह्य पार्थानां युध्यन्ते क्षत्रियर्षभाः ।। १८ ।। राजालोग रणक्षेत्रमें युद्ध करते हुए अपने जीवनकी रक्षा नहीं कर रहे हैं। वे क्षत्रियशिरोमणि नरेश पाण्डवोंकी सेनामें घुसकर युद्ध करते हैं ।। १८ ।।
यां तु कृष्णार्जुनौ सेनां यां सात्यकिवृकोदरौ । रक्षेयुन् को नु तां युध्येच्चमूमन्यत्र कौरवैः ।। १९ ।। श्रीकृष्ण, अर्जुन, सात्यकि तथा भीमसेन जिस सेनाकी रक्षा करते हों, उसके साथ कौरवोंके सिवा दूसरा कौन युद्ध कर सकता है? ।। १९ ।।
येषां योद्धा गुडाकेशो येषां मन्त्री जनार्दनः । येषां च सात्यकिर्योद्धा येषां योद्धा वृकोदरः ।। २० ।। को हि तान् विषहेद् योद्धुं मर्त्यधर्मा धनुर्धरः । अन्यत्र कौरवेयेभ्यो ये वा तेषां पदानुगाः ।। २१ ।। जिनके योद्धा गुडाकेश अर्जुन हैं, जिनके मन्त्री भगवान् श्रीकृष्ण हैं तथा जिनकी ओरसे युद्ध करनेवाले योद्धा सात्यकि और भीमसेन हैं, उनके साथ कौरवों तथा उनके चरण-चिह्नोंपर चलनेवाले अन्य नरेशोंको छोड़कर दूसरा कौन मरणधर्मा धनुर्धर युद्ध करनेका साहस कर सकता है? ।। २०-२१ ।।
यावत् तु शक्यते कर्तुमन्तरङ्गैर्जनाधिपैः । क्षत्रधर्मरतैः शूरैस्तावत् कुर्वन्ति कौरवाः ।। २२ ।।