महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 570, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवमुक्तः समाश्वस्तः सिन्धुराजो जयद्रथः । सम्प्रायात् सह गान्धारैर्वृतस्तैश्च महारथैः ॥ १६ ॥ वर्मिभिः सादिभिर्यत्तैः प्रासपाणिभिरास्थितैः । उनके ऐसा कहनेपर सिंधुराज जयद्रथको बड़ा आश्वासन मिला। वह गान्धार महारथियोंसे घिरा हुआ युद्धके लिये चल दिया। कवचधारी घुड़सवार हाथोंमें प्रास लिये पूरी सावधानीके साथ उन्हें घेरे हुए चल रहे थे ॥ १६ १/२ ॥ चामरापीडिनः सर्वे जाम्बूनदविभूषिताः ॥ १७ ॥ जयद्रथस्य राजेन्द्र हयाः साधुप्रवाहिनः । ते चैव सप्तसाहस्रास्त्रिसाहस्राश्च सैन्धवाः ॥ १८ ॥ राजेन्द्र! जयद्रथके घोड़े सवारीमें बहुत अच्छा काम देते थे। वे सब-के-सब चवँरकी कलँगीसे सुशोभित और सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित थे। उन सिंधुदेशीय अश्वोंकी संख्या दस हजार थी ॥ १७-१८ ॥ मत्तानां सुविरूढानां हस्त्यारोहैर्विशारदैः । नागानां भीमरूपाणां वर्मिणां रौद्रकर्मणाम् ॥ १९ ॥ अध्यर्धेन सहस्रेण पुत्रो दुर्मर्षणस्तव । अग्रतः सर्वसैन्यानां युध्यमानो व्यवस्थितः ॥ २० ॥ जिनपर युद्धकुशल हाथीसवार आरूढ थे, ऐसे भयंकर रूप तथा पराक्रमवाले डेढ़ हजार कवचधारी मतवाले गजराजोंके साथ आकर आपका पुत्र दुर्मर्षण युद्धके लिये उद्यत हो सम्पूर्ण सेनाओंके आगे खड़ा हुआ ॥ १९-२० ॥ ततो दुःशासनश्चैव विकर्णश्च तवात्मजौ । सिन्धुराजार्थसिद्धयर्थमग्रानीके व्यवस्थितौ ॥ २१ ॥ तत्पश्चात् आपके दो पुत्र दुःशासन और विकर्ण सिन्धुराज जयद्रथके अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये सेनाके अग्रभागमें खड़े हुए ॥ २१ ॥ दीर्घो द्वादश गव्यूतिः पश्चार्धे पञ्च विस्तृतः । व्यूहस्तु चक्रशकटो भारद्वाजेन निर्मितः ॥ २२ ॥ आचार्य द्रोणने चक्रगर्भ शकटव्यूहका निर्माण किया था, जिसकी लम्बाई बारह गव्यूति (चौबीस कोस) थी और पिछले भागकी चौड़ाई पाँच गव्यूति (दस कोस) थी ॥ नानानृपतिभिर्वीरैस्तत्र तत्र व्यवस्थितैः । रथाश्वगजपत्त्योधैर्द्रोणेन विहितः स्वयम् ॥ २३ ॥ यत्र-तत्र खड़े हुए अनेक नरपतियों तथा हाथीसवार, घुड़सवार, रथी और पैदल सैनिकोंद्वारा द्रोणाचार्यने स्वयं उस व्यूहकी रचना की थी ॥ २३ ॥ पश्चार्धे तस्य पद्मस्तु गर्भव्यूहः सुदुर्भिदः । सूची पद्मस्य गर्भस्थो गूढो व्यूहः कृतः पुनः ॥ २४ ॥