महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 579, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंउद्भ्रान्तनयनैर्वक्त्रैः संदष्टौष्ठपुटैः शुभैः । सकुण्डलशिरस्त्राणैर्वसुधा समकीर्यत ॥ ७ ॥ कुण्डल और टोपोंसहित उन रथियोंके घूमते हुए नेत्रों तथा दाँतोंद्वारा चबाये जाते हुए ओठोंवाले सुन्दर मुखोंसे सारी रणभूमि पट गयी ॥ ७ ॥
पुण्डरीकवनानीव विध्वस्तानि समन्ततः । विनिकीर्णानि योधानां वदनानि चकाशिरे ॥ ८ ॥ सब ओर बिखरे हुए योद्धाओंके मुख कटकर गिरे हुए कमल-समूहोंके समान सुशोभित होने लगे ॥ ८ ॥
तपनीयतनुत्राणाः संसिक्ता रुधिरेण च । संसक्ता इव दृश्यन्ते मेघसंघाः सविद्युतः ॥ ९ ॥ सुवर्णमय कवच धारण किये और खूनसे लथपथ हो एक-दूसरेसे सटे हुए हताहत योद्धाओंके शरीर विद्युत्सहित मेघसमूहोंके समान दिखायी देते थे ॥ ९ ॥
शिरसां पततां राजन् शब्दोऽभूद् वसुधातले । कालेन परिपक्वानां तालानां पततामिव ॥ १० ॥ राजन्! कालसे परिपक्व हुए ताड़के फलोंके पृथ्वीपर गिरनेसे जैसा शब्द होता है, उसी प्रकार रणभूमिमें कटकर गिरते हुए योद्धाओंके मस्तकोंका शब्द होता था ॥ १० ॥
ततः कबन्धं किंचित् तु धनुरलम्ब्य तिष्ठति । किंचित् खड्गं विनिष्कृष्य भुजेनोद्यम्य तिष्ठति ॥ ११ ॥ कोई-कोई कबन्ध (बिना सिरका धड़) धनुष लेकर खड़ा था और कोई तलवार खींचकर उसे हाथमें उठाये खड़ा हुआ था ॥ ११ ॥
पतितानि न जानन्ति शिरांसि पुरुषर्षभाः । अमृष्यमाणाः संग्रामे कौन्तेयं जयगृद्धिनः ॥ १२ ॥ संग्राममें विजयकी अभिलाषा रखनेवाले कितने ही श्रेष्ठ पुरुष कुन्तीपुत्र अर्जुनके प्रति अमर्षशील होकर यह भी न जान पाये कि उनके मस्तक कब कटकर गिर गये ॥ १२ ॥
हयानामुत्तमाङ्गैश्च हस्तेहस्तैश्च मेदिनी । बाहुभिश्च शिरोभिश्च वीराणां समकीर्यत ॥ १३ ॥ घोड़ोंके मस्तकों, हाथियोंकी सूँड़ों और वीरोंकी भुजाओं तथा सिरोंसे सारी रणभूमि आच्छादित हो गयी थी ॥ १३ ॥
अयं पार्थः कुतः पार्थ एष पार्थ इति प्रभो । तव सैन्येषु योधानां पार्थभूतमिवाभवत् ॥ १४ ॥ प्रभो! आपकी सेनाओंके समस्त योद्धाओंकी दृष्टिमें सब ओर अर्जुनमय-सा हो रहा था। वे बार-बार ‘यह अर्जुन है, कहाँ अर्जुन है? यह अर्जुन है’ इस प्रकार चिल्ला उठते थे ॥ १४ ॥