महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
महाभारत
श्रीकृष्ण ही परमार्थपद हैं
श्रीकृष्ण एव परमार्थपदं न चान्यत्
तज्ज्ञास्त एव जगतामिह कीर्तनीयाः ।
तद्ध्यानतः परममङ्गलमस्ति पुंसां
तज्ज्ञानमेव परमार्थपदैकलाभः ॥
भगवान् श्रीकृष्ण ही परमार्थपद हैं, उनके सिवा दूसरी कोई वस्तु परमार्थ नहीं है। जो उनके तत्त्वको जाननेवाले हैं, वे ही यहाँ सम्पूर्ण जगत्के लिये कीर्तनीय हैं—सब लोग उन्हींकी महिमाका बखान करते हैं। भगवान् श्रीकृष्णके ध्यानसे ही मनुष्योंका परम मंगल होता है तथा उनका ज्ञान ही एकमात्र परमार्थपदकी प्राप्ति है।