महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 600, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथान्यद् धनुरादाय कृतवर्मा महारथः । पञ्चभिः सायकैस्तूर्णं विव्याधोरसि भारत ॥ २२ ॥ भारत! तब महारथी कृतवर्माने दूसरा धनुष लेकर तुरंत ही पाँच बाणोंसे अर्जुनकी छातीमें चोट पहुँचायी ॥ २२ ॥
पुनश्च निशितैर्बाणैः पार्थं विव्याध पञ्चभिः । तं पार्थो नवभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे ॥ २३ ॥ फिर पाँच तीखे बाण और मारकर अर्जुनको घायल कर दिया। यह देख अर्जुनने कृतवर्माकी छातीमें नौ बाण मारे ॥ २३ ॥
दृष्ट्वा विषक्तं कौन्तेयं कृतवर्मरथं प्रति । चिन्तयामास वार्ष्णेयो न नः कालात्ययो भवेत् ॥ २४ ॥ कुन्तीकुमार अर्जुनको कृतवर्माके रथसे उलझे हुए देखकर भगवान् श्रीकृष्णने मन-ही-मन सोचा कि हमलोगोंका अधिक समय यहीं न व्यतीत हो जाय ॥ २४ ॥
ततः कृष्णोऽब्रवीत् पार्थं कृतवर्माणि मा दयाम् । कुरु सम्बन्धकं हित्वा प्रमथ्यैनं विशातय ॥ २५ ॥ तत्पश्चात् श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—'तुम कृतवर्मापर दया न करो। इस समय सम्बन्धी होनेका विचार छोड़कर इसे मथकर मार डालो' ॥ २५ ॥
ततः स कृतवर्माणं मोहयित्वार्जुनः शरैः । अभ्यगाज्जवनैरश्वैः काम्बोजानामनीकिनीम् ॥ २६ ॥ तब अर्जुन अपने बाणोंद्वारा कृतवर्माको मूर्च्छित करके अपने वेगशाली घोड़ोंद्वारा काम्बोजोंकी सेनापर आक्रमण करने लगे ॥ २६ ॥
अमर्षितस्तु हार्दिक्यः प्रविष्टे श्वेतवाहने । विधुन्वन् सशरं चापं पाञ्चाल्याभ्यां समागतः ॥ २७ ॥ श्वेतवाहन अर्जुनके व्यूहमें प्रवेश कर जानेपर कृतवर्माको बड़ा क्रोध हुआ। वह बाणसहित धनुषको हिलाता हुआ पांचालराजकुमार युधामन्यु और उत्तमौजासे भिड़ गया ॥ २७ ॥
चक्ररक्षौ तु पाञ्चाल्यावर्जुनस्य पदानुगौ । पर्यवारयदायान्तौ कृतवर्मा रथेषुभिः ॥ २८ ॥ वे दोनों पांचाल वीर अर्जुनके चक्ररक्षक होकर उनके पीछे-पीछे जा रहे थे। कृतवर्माने अपने रथ और बाणोंद्वारा वहाँ आते हुए उन दोनों वीरोंको रोक दिया ॥ २८ ॥
तावविध्यत् ततो भोजः कृतवर्मा शितैः शरैः । त्रिभिरेव युधामन्युं चतुर्भिश्चोत्तमौजसम् ॥ २९ ॥ भोजवंशी कृतवर्माने अपने तीन तीखे बाणोंद्वारा युधामन्युको और चार बाणोंसे उत्तमौजाको घायल कर दिया ॥ २९ ॥