महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 606, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँखवाले चौदह नाराचोंद्वारा घोड़े, ध्वज, धनुष और सारथिसहित सुदक्षिणको घायल कर दिया ।। ६८-६९ ।। रथं चान्यैः सुबहुभिश्चक्रे विशकलं शरैः । सुदक्षिणं तं काम्बोजं मोघसंकल्पविक्रमम् ।। ७० ।। बिभेद हृदि बाणेन पृथुधारेण पाण्डवः । फिर दूसरे बहुत-से बाणोंद्वारा उसके रथको टूक-टूक कर दिया और काम्बोजराज सुदक्षिणके संकल्प एवं पराक्रमको व्यर्थ करके पाण्डुपुत्र अर्जुनने मोटी धारवाले बाणसे उसकी छाती छेद डाली ।। ७० १/२ ।। स भिन्नवर्मा स्रस्ताङ्ग प्रभ्रष्टमुकुटाङ्गदः ।। ७१ ।। पपाताभिमुखः शूरो यन्त्रमुक्त इव ध्वजः । इससे उसका कवच फट गया, सारे अंग शिथिल हो गये, मुकुट और बाजूबंद गिर गये तथा शूरवीर सुदक्षिण मशीनसे फेंके गये ध्वजके समान मुँहके बल गिर पड़ा ।। ७१ १/२ ।। गिरेः शिखरजः श्रीमान् सुशाखः सुप्रतिष्ठितः ।। ७२ ।। निर्भग्न इव वातेन कर्णिकारो हिमात्यये । शेते स्म निहतो भूमौ काम्बोजास्तरणोचितः ।। ७३ ।। जैसे सर्दी बीतनेके बाद पर्वतके शिखरपर उत्पन्न हुआ सुन्दर शाखाओंसे युक्त, सुप्रतिष्ठित एवं शोभासम्पन्न कनेरका वृक्ष वायुके वेगसे टूटकर गिर जाता है, उसी प्रकार काम्बोजदेशके मुलायम बिछौनोंपर शयन करनेके योग्य सुदक्षिण वहाँ मारा जाकर पृथ्वीपर सो रहा था ।। महार्हाभरणोपेतः सानुमानिव पर्वत: । सुदर्शनीयस्ताम्राक्षः कर्णिना स सुदक्षिणः ।। ७४ ।। पुत्रः काम्बोजराजस्य पार्थेन विनिपातितः । बहुमूल्य आभूषणोंसे विभूषित एवं शिखरयुक्त पर्वतके समान सुदर्शनीय अरुण नेत्रोंवाले काम्बोज-राजकुमार सुदक्षिणको अर्जुनने एक ही बाणसे मार गिराया था ।। ७४ १/२ ।। धारयन्नग्निसंकाशां शिरसा काञ्चनीं स्रजम् ।। ७५ ।। अशोभत महाबाहुर्व्यसुर्भूमौ निपातितः । अपने मस्तकपर अग्निके समान चमकते हुए सुवर्णमय हारको धारण किये महाबाहु सुदक्षिण यद्यपि प्राणशून्य करके पृथ्वीपर गिराया गया था, तथापि उस अवस्थामें भी उसकी बड़ी शोभा हो रही थी ।। ७५ १/२ ।। ततः सर्वाणि सैन्यानि व्यद्रवन्त सुतस्य ते । हतं श्रुतायुधं दृष्ट्वा काम्बोजं च सुदक्षिणम् ।। ७६ ।।