भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 610, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 610

सिंहनादो महानासीद्धतं मत्वा धनंजयम् ॥ १५ ॥ प्रजानाथ! उस समय अर्जुनको मरा हुआ मानकर आपके सारे सैनिक जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ १५ ॥ कृष्णश्च भृशसंतप्तो दृष्ट्वा पार्थं विचेतनम् । आश्वासयत् सुहृद्याभिर्वाग्भिस्तत्र धनंजयम् ॥ १६ ॥ अर्जुनको अचेत हुआ देख भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त संतप्त हो उठे और मनको प्रिय लगनेवाले वचनोंद्वारा वहाँ उन्हें आश्वासन देने लगे ॥ १६ ॥ ततस्तौ रथिनां श्रेष्ठौ लब्धलक्ष्यौ धनंजयम् । वासुदेवं च वार्ष्णेयं शरवर्षैः समन्ततः ॥ १७ ॥ सचक्रकूबररथं साश्वध्वजपताकिनम् । अदृश्यं चक्रतुर्युद्धे तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १८ ॥ तदनन्तर रथियोंमें श्रेष्ठ श्रुतायु और अच्युतायुने अपना लक्ष्य सामने पाकर अर्जुन तथा वृष्णिवंशी श्रीकृष्णपर चारों ओरसे बाण-वर्षा करके चक्र, कूबर, रथ, अश्व, ध्वज और पताकासहित उन्हें उस रणक्षेत्रमें अदृश्य कर दिया। वह अद्भुत-सी बात हो गयी ॥ १७-१८ ॥ प्रत्याश्वस्तस्तु बीभत्सुः शनकैरिव भारत । प्रेतराजपुरं प्राप्य पुनः प्रत्यागतो यथा ॥ १९ ॥ भारत! फिर अर्जुन धीरे-धीरे सचेत हुए, मानो यमराजके नगरमें पहुँचकर पुनः वहाँसे लौटे हों ॥ १९ ॥ संछन्नं शरजालेन रथं दृष्ट्वा सकेशवम् । शत्रू चाभिमुखौ दृष्ट्वा दीप्यमानाविवानलौ ॥ २० ॥ प्रादुश्चक्रे ततः पार्थः शाक्रमस्त्रं महारथः । तस्मादासन् सहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् ॥ २१ ॥ उस समय भगवान् श्रीकृष्णसहित अपने रथको बाणसमूहसे आच्छादित और सामने खड़े हुए दोनों शत्रुओंको अग्निके समान देदीप्यमान देखकर महारथी अर्जुनने ऐन्द्रास्त्र प्रकट किया। उससे झुकी हुई गाँठवाले सहस्रों बाण प्रकट होने लगे ॥ २०-२१ ॥ ते जघ्नुस्तौ महेष्वासौ ताभ्यां मुक्तांश्च सायकान् । विचेरुराकाशगताः पार्थबाणविदारिताः ॥ २२ ॥ उन बाणोंने उन दोनों महाधनुर्धरोंको तथा उनके छोड़े हुए सायकोंको भी छिन्न-भिन्न कर दिया। अर्जुनके बाणोंसे टुकड़े-टुकड़े होकर उन शत्रुओंके बाण आकाशमें विचरने लगे ॥ २२ ॥ प्रतिहत्य शरांस्तूर्णं शरवेगेन पाण्डवः । प्रतस्थे तत्र तत्रैव योधयन् वै महारथान् ॥ २३ ॥