भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 613

सवारों और अनुचरोंसहित सहस्रों हाथी अर्जुनके बाणोंसे आहत हो मुँहसे रक्त वमन करते थे। उनके सम्पूर्ण अंग छिन्न-भिन्न हो रहे थे॥ ३९॥
चुक्रुशुश्च निपेतुश्च बभ्रमुश्चापरे दिशः।
भृशं त्रस्ताश्च बहवः स्वानेव ममृदुर्गजाः॥ ४० ॥
सान्तरायुधिनश्चैव द्विपास्तीक्ष्णविषोपमाः।
बहुत-से हाथी चिग्घाड़ रहे थे, बहुतेरे धराशायी हो गये थे, दूसरे कितने ही हाथी सम्पूर्ण दिशाओंमें चक्कर काट रहे थे और बहुत-से गज अत्यन्त भयभीत हो भागते हुए अपने ही पक्षके योद्धाओंको कुचल रहे थे। तीक्ष्ण विषवाले सर्पोंके समान भयंकर वे सभी हाथी गुप्तास्त्रधारी सैनिकोंसे युक्त थे॥ ४० १/२॥
विदन्त्यसुरमायां ये सुघोरा घोरचक्षुषः॥ ४१ ॥
यवनाः पारदाश्चैव शकाश्च सह बाह्लिकैः।
काकवर्णा दुराचाराः स्त्रीलोलाः कलहप्रियाः॥ ४२ ॥
जो आसुरी मायाको जानते हैं, जिनकी आकृति अत्यन्त भयंकर है तथा जो भयानक नेत्रोंसे युक्त हैं एवं जो कौओंके समान काले, दुराचारी, स्त्रीलम्पट और कलहप्रिय होते हैं वे यवन, पारद, शक और बाह्लीक भी वहाँ युद्धके लिये उपस्थित हुए॥ ४१-४२ ॥
द्राविडास्तत्र युध्यन्ते मत्तमातङ्गविक्रमाः।
गोयोनिप्रभवा म्लेच्छाः कालकल्पाः प्रहारिणः॥ ४३ ॥
मतवाले हाथियोंके समान पराक्रमी द्राविड तथा नन्दिनी गायसे उत्पन्न हुए कालके समान प्रहारकुशल म्लेच्छ भी वहाँ युद्ध कर रहे थे॥ ४३ ॥
दार्वातिसारा दरदाः पुण्ड्राश्चैव सहस्रशः।
ते न शक्याः स्म संख्यातुं व्रात्याः शतसहस्रशः॥ ४४ ॥
दार्वातिसार, दरद और पुण्ड्र आदि हजारों लाखों संस्कारशून्य म्लेच्छ वहाँ उपस्थित थे, जिनकी गणना नहीं की जा सकती थी॥ ४४ ॥
अभ्यवर्षन्त ते सर्वे पाण्डवं निशितैः शरैः।
अवाकिरंश्च ते म्लेच्छा नानायुद्धविशारदाः॥ ४५ ॥
नाना प्रकारके युद्धोंमें कुशल वे सभी म्लेच्छगण पाण्डुपुत्र अर्जुनपर तीखे बाणोंकी वर्षा करके उन्हें आच्छादित करने लगे॥ ४५ ॥
तेषामपि ससर्जाशु शरवृष्टिं धनंजयः।
सृष्टिस्तथाविधा ह्यासीच्छलभानामिवायतीः॥ ४६ ॥
तब अर्जुनने उनके ऊपर भी तुरंत बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ की। उनकी वह बाण-वृष्टि टिड्डी-दलोंकी सृष्टि-सी प्रतीत होती थी॥ ४६ ॥
अभ्रच्छायामिव शरैः सैन्ये कृत्वा धनंजयः।
मुण्डार्धमुण्डाञ्जटिलानशुचीञ्जटिलाननान्॥ ४७ ॥