महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 621, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिं न पश्यसि बाणौघान् क्रोशमात्रे किरीटिनः । पश्चाद् रथस्य पतितान् क्षिप्तान् शीघ्रं हि गच्छतः ॥ २१ ॥ क्या तुम देखते नहीं हो कि मेरे चलाये हुए बाणसमूह शीघ्रगामी अर्जुनके रथके एक कोस पीछे पड़े हैं ॥ २१ ॥
न चाहं शीघ्रयानेऽद्य समर्थो वयसान्वितः । सेनामुखे च पार्थानामेतद् बलमुपस्थितम् ॥ २२ ॥ मैं बूढ़ा हो गया। अतः अब मैं शीघ्रतापूर्वक रथ चलानेमें असमर्थ हूँ। इधर मेरी सेनाके सामने यह कुन्तीकुमारोंकी भारी सेना उपस्थित है ॥ २२ ॥
युधिष्ठिरश्च मे ग्राह्यो मिषतां सर्वधन्विनाम् । एवं मया प्रतिज्ञातं क्षत्रमध्ये महाभुज ॥ २३ ॥ महाबाहो! मैंने क्षत्रियोंके बीचमें यह प्रतिज्ञा की है कि समस्त धनुर्धरोंके देखते-देखते युधिष्ठिरको कैद कर लूँगा ॥ २३ ॥
धनंजयेन चोत्सृष्टो वर्तते प्रमुखे नृप । तस्माद् व्यूहमुखं हित्वा नाहं योत्स्यामि फाल्गुनम् ॥ २४ ॥ नरेश्वर! इस समय युधिष्ठिर अर्जुनसे रहित होकर मेरे सामने खड़े हैं। ऐसी अवस्थामें मैं व्यूहका द्वार छोड़कर अर्जुनके साथ युद्ध करनेके लिये नहीं जाऊँगा ॥ २४ ॥
तुल्याभिजनकर्म्माणं शत्रुमेकं सहायवान् । गत्वा योधय मा भैस्त्वं त्वं ह्यस्य जगतः पतिः ॥ २५ ॥ तुम्हारे शत्रु अर्जुन भी तो तुम्हारे-जैसे ही कुल और पराक्रमसे युक्त हैं। इस समय वे अकेले हैं और तुम सहायकोंसे सम्पन्न हो। (वे राज्यसे च्युत हो गये हैं और तुम) इस सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हो। अतः डरो मत। जाकर अर्जुनसे युद्ध करो ॥ २५ ॥
राजा शूरः कृती दक्षो वैरमुत्पाद्य पाण्डवैः । वीर स्वयं प्रयाह्यात्र यत्र पार्थो धनंजयः ॥ २६ ॥ तुम राजा, शूरवीर, विद्वान् और युद्धकुशल हो। वीर! तुमने ही पाण्डवोंके साथ वैर बाँधा है। अतः जहाँ कुन्तीकुमार अर्जुन गये हैं, वहाँ उनसे युद्ध करनेके लिये स्वयं ही शीघ्रतापूर्वक जाओ ॥ २६ ॥
दुर्योधन उवाच
कथं त्वामप्यतिक्रान्तः सर्वशस्त्रभृतां वरम् । धनंजयो मया शक्य आचार्य प्रतिबाधितुम् ॥ २७ ॥ दुर्योधन बोला—आचार्य! आप सम्पूर्ण शस्त्र-धारियोंमें श्रेष्ठ हैं। जो आपको भी लाँघकर आगे बढ़ गया, वह अर्जुन मेरे द्वारा कैसे रोका जा सकता है? ॥
अपि शक्यो रणे जेतुं वज्रहस्तः पुरंदरः ।