महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 623, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयोध्यन्ति त्रयो लोकाः सनरा नास्ति ते भयम् ॥ ३६ ॥ यदि मनुष्योंसहित देवता, असुर, यक्ष, नाग, राक्षस तथा तीनों लोकके प्राणी तुमसे युद्ध करते हों तो भी आज तुम्हें कोई भय नहीं होगा ॥ ३६ ॥ न कृष्णो न च कौन्तेयो न चान्यः शस्त्रभृद् रणे । शरानर्पयितुं कश्चित् कवचे तव शक्ष्यति ॥ ३७ ॥ इस कवचके रहते हुए श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा दूसरे कोई शस्त्रधारी योद्धा भी तुम्हें बाणोंद्वारा चोट पहुँचानेमें समर्थ न हो सकेंगे ॥ ३७ ॥ स त्वं कवचमास्थाय क्रुद्धमद्य रणेऽर्जुनम् । त्वरमाणः स्वयं याहि न त्वासौ विसहिष्यति ॥ ३८ ॥ अतः तुम यह कवच धारण करके शीघ्रतापूर्वक रणक्षेत्रमें कुपित हुए अर्जुनका सामना करनेके लिये स्वयं ही जाओ। वे तुम्हारा वेग नहीं सह सकेंगे ॥ ३८ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा त्वरन् द्रोणः स्पृष्ट्वाम्भा वर्म भास्वरम् । आबबन्धाद्भुततमं जपन् मन्त्रं यथाविधि ॥ ३९ ॥ रणे तस्मिन् सुमहति विजयाय सुतस्य ते । विसिस्मापयिषुल्लोकान् विद्यया ब्रह्मवित्तमः ॥ ४० ॥ संजय कहते हैं— राजन्! ऐसा कहकर वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यने अपनी विद्याके प्रभावसे सब लोगोंको आश्चर्यमें डालनेकी इच्छा रखते हुए तुरंत आचमन करके उस महायुद्धमें आपके पुत्र दुर्योधनकी विजयके लिये उसके शरीरमें विधिपूर्वक मन्त्रजपके साथ-साथ वह अत्यन्त तेजस्वी अद्भुत कवच बाँध दिया ॥ ३९-४० ॥
द्रोण उवाच
करोतु स्वस्ति ते ब्रह्म ब्रह्मा चापि द्विजातयः । सरीसृपाश्च ये श्रेष्ठास्तेभ्यस्ते स्वस्ति भारत ॥ ४१ ॥ द्रोणाचार्य बोले— भरतनन्दन! परब्रह्म परमात्मा तुम्हारा कल्याण करें। ब्रह्माजी तथा ब्राह्मण तुम्हारा मंगल करें। जो श्रेष्ठ सर्प हैं, उनसे भी तुम्हारा कल्याण हो ॥ ४१ ॥ ययातिर्नाहुषश्चैव धुन्धुमारो भगीरथः । तुभ्यं राजर्षयः सर्वे स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा ॥ ४२ ॥ नहुषपुत्र ययाति, धुन्धुमार और भगीरथ आदि सभी राजर्षि सदा तुम्हारी भलाई करें ॥ ४२ ॥ स्वस्ति तेऽस्त्वेकपादेभ्यो बहुपादेभ्य एव च । स्वस्त्यस्त्वपादकेभ्यश्च नित्यं तव महारणे ॥ ४३ ॥