महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 63, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयोधांस्तु बहुधा हत्वा पितृलोकं गमिष्यति । ‘कुरुश्रेष्ठ! कोश-संग्रह, मन्त्रणा, व्यूह-रचना तथा अस्त्र-शस्त्रोंके प्रहारमें आपके समान कौरववंशमें दूसरा कोई मुझे नहीं दिखायी देता, जो अपनी विशुद्ध बुद्धिसे युक्त हो समस्त कौरवोंको भयसे उबार सके तथा यहाँ बहुत-से योद्धाओंका वध करके अन्तमें पितृ-लोकको प्राप्त हो ।।
अद्यप्रभृति संक्रुद्धा व्याघ्रा इव मृगक्षयम् ।। १३ ।।
पाण्डवा भरतश्रेष्ठ करिष्यन्ति कुरुक्षयम् ।
‘भरतश्रेष्ठ! आजसे क्रोधमें भरे हुए पाण्डव उसी प्रकार कौरवोंका विनाश करेंगे, जैसे व्याघ्र हिरनोंका ।।
अद्य गाण्डीवघोषस्य वीर्यज्ञाः सव्यसाचिनः ।। १४ ।।
कुरवः संत्रसिष्यन्ति वज्रपाणेरिवासुराः ।
‘आज गाण्डीवकी टंकार करनेवाले सव्यसाची अर्जुनके पराक्रमको जाननेवाले कौरव उनसे उसी प्रकार डरेंगे, जैसे वज्रधारी इन्द्रसे असुर भयभीत होते हैं ।।
अद्य गाण्डीवमुक्ताना-
मशनीनामिव स्वनः ।। १५ ।।
त्रासयिष्यति बाणानां
कुरूनन्यांश्च पार्थिवान् ।
‘आज गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंका वज्रपातके समान शब्द कौरवों तथा अन्य राजाओंको भयभीत कर देगा ।। १५ १/२ ।।
समिद्धोऽग्निर्यथा वीर
महाज्वालो द्रुमान् दहेत् ।। १६ ।।
धार्तराष्ट्रान् प्रधक्ष्यन्ति
तथा बाणाः किरीटिनः ।
‘वीर! जैसे बड़ी-बड़ी लपटोंसे युक्त प्रज्वलित हुई आग वृक्षोंको जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनके बाण धृतराष्ट्रके पुत्रों तथा उनके सैनिकोंको जला डालेंगे ।। १६ १/२ ।।
येन येन प्रसरतो वाय्वग्नी सहितौ वने ।। १७ ।।
तेन तेन प्रदहतो भूरिगुल्मतृणद्रुमान् ।
‘वायु और अग्निदेव—ये दोनों एक साथ वनमें जिस-जिस मार्गसे फैलते हैं, उसी-उसीके द्वारा बहुत-से तृण, वृक्ष और लताओंको भस्म करते जाते हैं ।।
यादृशोऽग्निः समृद्धस्तादृक् पार्थो न संशयः ।। १८ ।।
यथा वायुर्नरव्याघ्र तथा कृष्णो न संशयः ।