महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसी प्रकार दूसरे महाबली शूरवीर नरेश भी उस युद्धस्थलमें सब ओरसे लौटकर पांचालोंका ही प्रतिरोध करने लगे ।। १४ ।।
ततो रणे नरव्याघ्रः पार्षतः पाण्डवैः सह । संजघानासकृद् द्रोणं बिभित्सुररिवाहिनीम् ।। १५ ।। तदनन्तर रणक्षेत्रमें पाण्डवोंसहित नरश्रेष्ठ धृष्टद्युम्नने शत्रुसेनाके व्यूहका भेदन करनेकी इच्छासे द्रोणाचार्यपर बारंबार प्रहार किया ।। १५ ।।
यथैव शरवर्षाणि द्रोणो वर्षति पार्षते । तथैव शरवर्षाणि धृष्टद्युम्नोऽप्यवर्षत ।। १६ ।। आचार्य द्रोण धृष्टद्युम्नपर जैसे बाणोंकी वर्षा करते थे, धृष्टद्युम्न भी द्रोणपर वैसे ही बाण बरसाते थे ।। १६ ।।
सनिस्त्रिंशपुरोवातः शक्तिप्रासर्ष्टिसंवृतः । ज्याविद्युच्चापसंह्लादो धृष्टद्युम्नबलाहकः ।। १७ ।। शरधाराश्मवर्षाणि व्यसृजत् सर्वतो दिशम् । निघ्नन् रथवराश्वौघान् प्लावयामास वाहिनीम् ।। १८ ।। उस समय धृष्टद्युम्न एक महामेघके समान जान पड़ते थे। उनकी तलवार पुरवैया हवाके समान चल रही थी। वे शक्ति, प्रास एवं ऋष्टि आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे। उनकी प्रत्यंचा विद्युत्के समान प्रकाशित होती थी। धनुषकी टंकार मेघगर्जनाके समान जान पड़ती थी। उस धृष्टद्युम्नरूपी मेघने श्रेष्ठ रथी और घुड़सवारोंके समूहरूपी खेतीको नष्ट करनेके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें बाणरूपी जलकी धारा और अस्त्र-शस्त्ररूपी पत्थर बरसाते हुए शत्रु-सेनाको आप्लावित कर दिया ।। १७-१८ ।।
यं यमार्ज्छच्छरैर्द्रोणः पाण्डवानां रथव्रजम् । ततस्ततः शरैर्द्रोणमपाकर्षत पार्षतः ।। १९ ।। द्रोणाचार्य बाणोंद्वारा पाण्डवोंकी जिस-जिस रथसेनापर आक्रमण करते थे, धृष्टद्युम्न तत्काल बाणोंकी वर्षा करके उस-उस ओरसे उन्हें लौटा देते थे ।। १९ ।।
तथा तु यतमानस्य द्रोणस्य युधि भारत । धृष्टद्युम्नं समासाद्य त्रिधा सैन्यमभिद्यत ।। २० ।। भारत! युद्धमें इस प्रकार विजयके लिये प्रयत्नशील हुए द्रोणाचार्यकी सेना धृष्टद्युम्नके पास पहुँचकर तीन भागोंमें बँट गयी ।। २० ।।
भोजमेकेऽभ्यवर्तन्त जलसंधं तथापरे । पाण्डवैर्हन्यमानाश्च द्रोणमेवापरे ययुः ।। २१ ।। पाण्डव-योद्धाओंकी मार खाकर कुछ सैनिक कृतवर्माके पास चले गये, दूसरे जलसंधके पास भाग गये और शेष सभी योद्धा द्रोणाचार्यका ही अनुसरण करने लगे ।। २१ ।।