भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 633

प्रजानाथ! महारथी द्रोणने उस युद्धस्थलमें शत्रुसेनाके प्रत्येक रथ, हाथी, अश्व और पैदल सैनिकको एक-एक बाणसे घायल कर दिया ।। २९ ।। पाण्डवानां तु सैन्येषु नास्ति कश्चित् स भारत । दधार यो रणे बाणान् द्रोणचापच्युतान् प्रभो ।। ३० ।। भारत! प्रभो! उस समय पाण्डवोंकी सेनामें कोई ऐसा वीर नहीं था, जो रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्यके धनुषसे छूटे हुए बाणोंको धैर्यपूर्वक सह सका हो ।। ३० ।। तत् पच्यमानमर्केण द्रोणसायकतापितम् । बभ्राम पार्षतं सैन्यं तत्र तत्रैव भारत ।। ३१ ।। भरतनन्दन! सूर्यके द्वारा अपनी किरणोंसे पकायी जाती हुई-सी धृष्टद्युम्नकी सेना द्रोणाचार्यके बाणोंसे संतप्त हो जहाँ-तहाँ चक्कर काटने लगी ।। ३१ ।। तथैव पार्षतेनापि काल्यमानं बलं तव । अभवत् सर्वतो दीप्तं शुष्कं वनमिवाग्निना ।। ३२ ।। इसी प्रकार धृष्टद्युम्नके द्वारा खदेड़ी जाती हुई आपकी सेना भी सब ओरसे आग लग जानेके कारण प्रज्वलित हुए सूखे वनकी भाँति दग्ध हो रही थी ।। ३२ ।। बाध्यमानेषु सैन्येषु द्रोणपार्षतसायकैः । त्यक्त्वा प्राणान् परं शक्त्या युध्यन्ते सर्वतोमुखाः ।। ३३ ।। द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नके बाणोंद्वारा सेनाओंके पीड़ित होनेपर भी सब लोग प्राणोंका मोह छोड़कर पूरी शक्तिसे सब ओर युद्ध कर रहे थे ।। ३३ ।। तावकानां परेषां च युध्यतां भरतर्षभ । नासीत् कश्चिन्महाराज योऽत्याक्षीत् संयुगं भयात् ।। ३४ ।। भरतभूषण! महाराज! वहाँ युद्ध करते हुए आपके और शत्रुओंके योद्धाओंमें कोई ऐसा नहीं था, जिसने भयके कारण युद्धका मैदान छोड़ दिया हो ।। ३४ ।। भीमसेनं तु कौन्तेयं सोदर्याः पर्यवारयन् । विविंशतिश्चित्रसेनो विकर्णश्च महारथः ।। ३५ ।। उस समय विविंशति, चित्रसेन तथा महारथी विकर्ण—इन तीनों भाइयोंने कुन्तीपुत्र भीमसेनको घेर लिया ।। ३५ ।। विन्दानुविन्दावावन्त्यौ क्षेमधूर्तिश्च वीर्यवान् । त्रयाणां तव पुत्राणां त्रय एवानुयायिनः ।। ३६ ।। अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द तथा पराक्रमी क्षेमधूर्ति—ये तीनों ही आपके पूर्वोक्त तीनों पुत्रोंके अनुयायी थे ।। ३६ ।। बाह्लीकराजस्तेजस्वी कुलपुत्रो महारथः । सहसेनः सहामात्यो द्रौपदेयानवारयत् ।। ३७ ।।