भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 648

थी ।। १४ ।।
इषुजालावृतं घोरमन्धकारं समन्ततः ।
अनाधृष्यमिवान्येषां शूराणामभवत् तदा ।। १५ ।।
चारों ओर बाणोंका जाल-सा बिछ जानेके कारण वहाँ घोर अन्धकार छा गया था। उस समय अन्य शूरवीरोंका वहाँ पहुँचना असम्भव-सा हो गया ।। १५ ।।
अन्धकारीकृते लोके द्रोणशैनेययोः शरैः ।
तयोः शीघ्रास्त्रविदुषोर्द्रोणसात्वतयोस्तदा ।। १६ ।।
नान्तरं शरवृष्टीनां ददृशे नरसिंहयोः ।
शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेकी कलाको जाननेवाले द्रोणाचार्य तथा सात्वतवंशी सात्यकिके बाणोंसे लोकमें अन्धकार छा जानेपर भी उस समय उन दोनों पुरुषसिंहोंकी बाण-वर्षा में कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था ।। १६<sup></sup>/<sub></sub> ।।
इषूणां संनिपातेन शब्दो धाराभिघातजः ।। १७ ।।
शुश्रुवे शक्रमुक्तानामशनीनामिव स्वनः ।
बाणोंके परस्पर टकरानेसे उनकी धारोंके आघात-प्रत्याघातसे जो शब्द होता था, वह इन्द्रके छोड़े हुए वज्रास्त्रोंकी गड़गड़ाहटके समान सुनायी पड़ता था ।।
नाराचैर्व्यतिविद्धानां शराणां रूपमाबभौ ।। १८ ।।
आशीविषविदष्टानां सर्पाणामिव भारत ।
भरतनन्दन! नाराचोंसे अत्यन्त विद्ध हुए बाणोंका स्वरूप विषधर नागोंके डँसे हुए सर्पोंके समान जान पड़ता था ।। १८<sup></sup>/<sub></sub> ।।
तयोर्ज्यातलनिर्घोषः शुश्रुवे युद्धशौण्डयोः ।। १९ ।।
अजस्रं शैलशृङ्गाणां वज्रेणाहन्यतामिव ।
उन दोनों युद्धकुशल वीरोंके धनुषोंकी प्रत्यंचाकी टंकारध्वनि ऐसी सुनायी देती थी, मानो पर्वतोंके शिखरोंपर निरन्तर वज्रसे आघात किया जा रहा हो ।।
उभयोस्तौ रथौ राजंस्ते चाश्वास्तौ च सारथी ।। २० ।।
रुक्मपुङ्खैः शरैश्छिन्नाश्चित्ररूपा बभूवुस्तदा ।
राजन्! उन दोनोंके वे रथ, वे घोड़े और वे सारथि सुवर्णमय पंखवाले बाणोंसे क्षत-विक्षत होकर उस समय विचित्ररूपसे सुशोभित हो रहे थे ।। २०<sup></sup>/<sub></sub> ।।
निर्मलानामजिह्मानां नाराचानां विशाम्पते ।। २१ ।।
निर्मुक्ताशीविषाभानां सम्पातोऽभूत् सुदारुणः ।
प्रजानाथ! केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पोंके समान निर्मल और सीधे जानेवाले नाराचोंका प्रहार वहाँ बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ।। २१<sup></sup>/<sub></sub> ।।
उभयोः पतिते छत्रे तथैव पतितौ ध्वजौ ।। २२ ।।
उभौ रुधिरसिक्ताङ्गावुभौ च विजयैषिणौ ।