महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 658, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिचकर्त स संछिन्नः पपाताद्रिचयो यथा ॥ २९ ॥ तब अर्जुनने छः बाणोंद्वारा उसकी गर्दन, दोनों पैरों, दोनों भुजाओं तथा मस्तकको भी काट डाला। इस प्रकार छिन्न-भिन्न होकर वह पर्वतसमूहके समान धराशायी हो गया ॥ २९ ॥ ततस्तौ निहतौ दृष्ट्वा तयो राजन् पदानुगाः । अभ्यद्रवन्त संक्रुद्धाः किरन्तः शतशः शरान् ॥ ३० ॥ राजन्! तब उन दोनों भाइयोंको मारा गया देख उनके सेवकगण अत्यन्त कुपित हो अर्जुनपर सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करते हुए टूट पड़े ॥ ३० ॥ तानर्जुनः शरैस्तूर्णं निहत्य भरतर्षभ । व्यरोचत यथा वह्निर्दवं दग्ध्वा हिमात्यये ॥ ३१ ॥ भरतश्रेष्ठ! अर्जुन बाणोंद्वारा तुरंत ही उन सबका संहार करके ग्रीष्म-ऋतुमें वनको जलाकर प्रकाशित होनेवाले अग्निदेवके समान सुशोभित हुए ॥ ३१ ॥ तयोः सेनामतिक्रम्य कृच्छ्रादिव धनंजयः । विबभौ जलदं हित्वा दिवाकर इवोदितः ॥ ३२ ॥ उन दोनोंकी सेनाका बड़ी कठिनाईसे उल्लंघन करके अर्जुन मेघोंका आवरण भेदकर उदित हुए सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे ॥ ३२ ॥ तं दृष्ट्वा कुरवस्त्रस्ताः प्रहृष्टाश्चाभवन् पुनः । अभ्यवर्तन्त पार्थं च समन्ताद् भरचर्षभ ॥ ३३ ॥ भरतश्रेष्ठ! उन्हें देखकर कौरव-सैनिक पहले तो भयभीत हुए। फिर प्रसन्न भी हो गये। वे चारों ओरसे कुन्तीकुमारका सामना करनेके लिये डट गये ॥ ३३ ॥ श्रान्तं चैनं समालक्ष्य ज्ञात्वा दूरे च सैन्धवम् । सिंहनादेन महता सर्वतः पर्यवारयन् ॥ ३४ ॥ अर्जुनको थका हुआ देख और सिन्धुराज जयद्रथको उनसे बहुत दूर जानकर आपके सैनिकोंने महान् सिंहनाद करते हुए उन्हें सब ओरसे घेर लिया ॥ ३४ ॥ तांस्तु दृष्ट्वा सुसंरब्धानुत्स्मयन् पुरुषर्षभः । शनकैरिव दाशार्हमर्जुनो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३५ ॥ उन सबको क्रोधमें भरा देख पुरुषशिरोमणि अर्जुनने मुसकराते हुए धीरे-धीरे भगवान् श्रीकृष्णसे कहा— ॥ ३५ ॥ शरार्दिताश्च ग्लानाश्च हया दूरे च सैन्धवः । किमिहानन्तरं कार्यं ज्यायिष्ठं तव रोचते ॥ ३६ ॥ 'मेरे घोड़े बाणोंसे पीड़ित हो बहुत थक गये हैं और सिन्धुराज जयद्रथ अभी बहुत दूर है। अतः इस समय यहाँ कौन-सा कार्य आपको श्रेष्ठ जान पड़ता है ॥ ३६ ॥ ब्रूहि कृष्ण यथातत्त्वं त्वं हि प्राज्ञतमः सदा ।