भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

हिमवद्दुर्गनिलयाः किराता रणकर्कशाः । दुर्योधनस्य वशगास्त्वया कर्ण पुरा कृताः ॥ ७ ॥ ‘कर्ण! पूर्वकालमें तुमने हिमालयके दुर्गमें निवास करनेवाले रणकर्कश किरातोंको भी जीतकर दुर्योधनके अधीन कर दिया था ॥ ७ ॥

उत्कला मेकलाः पौण्ड्राः कलिङ्गान्ध्राश्च संयुगे । निषादाश्च त्रिगर्ताश्च बाह्लीकाश्च जितास्त्वया ॥ ८ ॥ ‘उत्कल, मेकल, पौण्ड्र, कलिंग, अंध्र, निषाद, त्रिगर्त और बाह्लीक आदि देशोंके राजाओंको भी तुमने परास्त किया है ॥ ८ ॥

तत्र तत्र च संग्रामे दुर्योधनहितैषिणा । बहवश्च जिताः कर्ण त्वया वीरा महौजसा ॥ ९ ॥ ‘कर्ण! इनके सिवा और भी जहाँ-तहाँ संग्राम-भूमिमें दुर्योधनका हित चाहनेवाले तुम महापराक्रमी शूरवीरने बहुत-से वीरोंपर विजय पायी है ॥ ९ ॥

यथा दुर्योधनस्तात सजातिकुलबान्धवः । तथा त्वमपि सर्वेषां कौरवाणां गतिर्भव ॥ १० ॥ ‘तात! कुटुम्बी, कुल और बन्धु-बान्धवोंसहित दुर्योधन जैसे सब कौरवोंका आधार है, उसी प्रकार तुम भी कौरवोंके आश्रयदाता बनो ॥ १० ॥

शिवेनाभिवदामि त्वां गच्छ युध्यस्व शत्रुभिः । अनुशाधि कुरून् संख्ये धत्स्व दुर्योधने जयम् ॥ ११ ॥ ‘मैं तुम्हारा कल्याणचिन्तन करते हुए तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ, जाओ, शत्रुओंके साथ युद्ध करो। रणक्षेत्रमें कौरव सैनिकोंको कर्तव्यका आदेश दो और दुर्योधनको विजय प्राप्त कराओ ॥ ११ ॥

भवान् पौत्रसमोऽस्माकं यथा दुर्योधनस्तथा । तवापि धर्मतः सर्वे यथा तस्य वयं तथा ॥ १२ ॥ ‘दुर्योधनकी तरह तुम भी मेरे पौत्रके समान हो। धर्मतः जैसे मैं उसका हितैषी हूँ, उसी प्रकार तुम्हारा भी हूँ ॥

यौनात् सम्बन्धकाल्लोके विशिष्टं संगतं सताम् । सद्भिः सह नरश्रेष्ठ प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ १३ ॥ ‘नरश्रेष्ठ! संसारमें यौन (कौटुम्बिक)-सम्बन्धकी अपेक्षा साधु पुरुषोंके साथ की हुई मैत्रीका सम्बन्ध श्रेष्ठ है; यह मनीषी महात्मा कहते हैं ॥ १३ ॥

स सत्यसंगतो भूत्वा ममेदमिति निश्चितः । कुरूणां पालय बलं यथा दुर्योधनस्तथा ॥ १४ ॥ ‘तुम सच्चे मित्र होकर और यह सब कुछ मेरा ही है, ऐसा निश्चित विचार रखकर दुर्योधनके ही समान समस्त कौरवदलकी रक्षा करो' ॥ १४ ॥