भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 671, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 671

विमुक्तौ शस्त्रसम्बाधाद् द्रोणानीकात् सुदुर्भिदात् ।
अदृश्येतां महात्मानौ कालसूर्याविवोदितौ ॥ ७ ॥
शस्त्रोंसे भरे हुए आचार्य द्रोणके दुर्भेद्य सैन्यव्यूहसे छुटकारा पाकर महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन उदित हुए प्रलयकालके सूर्यके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ७ ॥

अस्त्रसम्बाधनिर्मुक्तौ विमुक्तौ शस्त्रसंकटात् ।
अदृश्येतां महात्मानौ शत्रुसम्बाधकारिणौ ॥ ८ ॥
विमुक्तौ ज्वलनस्पर्शान्मकरास्याज्झषाविव ।
शत्रुओंको संतप्त करनेवाले वे दोनों महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन अग्निके समान दाहक स्पर्शवाले मगरके मुखसे छूटे हुए दो मत्स्योंके समान अस्त्र-शस्त्रोंकी बाधाओं तथा संकटोंसे मुक्त दिखायी दे रहे थे ॥ ८ १/२ ॥

अक्षोभ्येतां सेनां तौ समुद्रं मकराविव ॥ ९ ॥
तावकास्तव पुत्राश्च द्रोणानीकस्थयोस्तयोः ।
नैतौ तरिष्यतो द्रोणमिति चक्रुस्तदा मतिम् ॥ १० ॥
जैसे दो मगर समुद्रको क्षुब्ध कर देते हैं, उसी प्रकार उन दोनोंने सारी सेनाको व्याकुल कर दिया। आपके सैनिकों तथा पुत्रोंने उस समय द्रोणाचार्यके सैन्यव्यूहमें घुसे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनके सम्बन्धमें यह विचार किया था कि ये दोनों द्रोणको नहीं लाँघ सकेंगे ॥ ९-१० ॥

तौ तु दृष्ट्वा व्यतिक्रान्तौ द्रोणानीकं महाद्युती ।
नाशशंसुर्महाराज सिन्धुराजस्य जीवितम् ॥ ११ ॥
परंतु महाराज! जब वे दोनों महातेजस्वी वीर द्रोणाचार्यके सैन्यव्यूहको लाँघ गये, तब उन्हें देखकर आपके पुत्रोंको सिन्धुराजके जीवित रहनेकी आशा नहीं रह गयी ॥ ११ ॥

आशा बलवती राजन् सिन्धुराजस्य जीविते ।
द्रोणहार्दिक्ययोः कृष्णौ न मोक्ष्यते इति प्रभो ॥ १२ ॥
राजन्! प्रभो! सब लोगोंको यह सोचकर कि श्रीकृष्ण और अर्जुन द्रोणाचार्य तथा कृतवर्माके हाथसे नहीं छूट सकेंगे, सिन्धुराजके जीवनकी आशा प्रबल हो उठी थी ॥ १२ ॥

तामाशां विफलीकृत्य संतीर्णौ तौ परंतपौ ।
द्रोणानीकं महाराज भोजानीकं च दुस्तरम् ॥ १३ ॥
महाराज! शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन लोगोंकी उस आशाको विफल करके द्रोणाचार्य तथा कृतवर्माकी दुस्तर सेनाको लाँघ गये ॥ १३ ॥

अथ दृष्ट्वा व्यतिक्रान्तौ ज्वलिताविव पावकौ ।
निराशाः सिन्धुराजस्य जीवितं न शशंसिरे ॥ १४ ॥