महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 674, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंइति कृष्णौ महेष्वासौ प्रशस्तौ लोकविश्रुतौ । सर्वभूतान्यमन्यन्त द्रोणास्त्रबलवारणात् ॥ २९ ॥ इस प्रकार द्रोणाचार्यके अस्त्र-बलका निवारण करनेके कारण समस्त प्राणी श्रीकृष्ण और अर्जुनको लोकविख्यात प्रशस्त गुणयुक्त महाधनुर्धर मानने लगे ॥ २९ ॥ जयद्रथं समीपस्थमवेक्षन्तौ जिघांसया । रुरुं निपाने लिप्सन्तौ व्याघ्राविव व्यतिष्ठताम् ॥ ३० ॥ जैसे पानी पीनेके घाटपर आये हुए रुरुमृगको दबोच लेनेकी इच्छासे दो व्याघ्र खड़े हों, उसी प्रकार निकटवर्ती जयद्रथको मार डालनेकी इच्छासे उसकी ओर देखते हुए वे दोनों वीर खड़े थे ॥ ३० ॥ यथा हि मुखवर्णोऽयमनयोरिति मेनिरे । तव योधा महाराज हतमेव जयद्रथम् ॥ ३१ ॥ महाराज! उस समय उन दोनोंके मुखपर जैसी समुज्ज्वल कान्ति थी, उसके अनुसार आपके योद्धाओंने जयद्रथको मरा हुआ ही माना ॥ ३१ ॥ लोहिताक्षौ महाबाहू संयुक्तौ कृष्णपाण्डवौ । सिन्धुराजमभिप्रेक्ष्य हृष्टौ व्यनदतां मुहुः ॥ ३२ ॥ एक साथ बैठे हुए लाल नेत्रोंवाले महाबाहु श्रीकृष्ण और अर्जुन सिन्धुराज जयद्रथको देखकर हर्षसे उल्लसित हो बारंबार गर्जना करने लगे ॥ ३२ ॥ शौरेरभीषुहस्तस्य पार्थस्य च धनुष्मतः । तयोरासीत् प्रभा राजन् सूर्यपावकयोरिव ॥ ३३ ॥ राजन्! हाथोंमें बागडोर लिये श्रीकृष्ण और धनुष धारण किये अर्जुन—इन दोनोंकी प्रभा सूर्य और अग्निके समान जान पड़ती थी ॥ ३३ ॥ हर्ष एव तयोरासीद् द्रोणानीकप्रमुक्तयोः । समीपे सैन्धवं दृष्ट्वा श्येनयोरामिषं यथा ॥ ३४ ॥ जैसे मांसका टुकड़ा देखकर दो बाजोंको प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यकी सेनासे मुक्त हुए उन दोनों वीरोंको अपने पास ही जयद्रथको देखकर सब प्रकारसे हर्ष ही हुआ ॥ ३४ ॥ तौ तु सैन्धवमालोक्य वर्तमानमिवान्तिके । सहसा पेततुः क्रुद्धौ क्षिप्रं श्येनाविवामिषम् ॥ ३५ ॥ अपने समीप ही खड़े हुए-से सिन्धुराज जयद्रथको देखकर तत्काल वे दोनों वीर कुपित हो उसी प्रकार सहसा उसपर टूट पड़े, जैसे दो बाज मांसपर झपट रहे हों ॥ ३५ ॥ तौ दृष्ट्वा तु व्यतिक्रान्तौ हृषीकेशधनंजयौ । सिन्धुराजस्य रक्षार्थं पराक्रान्तः सुतस्तव ॥ ३६ ॥