भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 677

आज यह तुम्हारे बाणोंके मार्गमें आ पहुँचा है। इसे तुम अपनी सफलता समझो; अन्यथा राज्यकी अभिलाषा रखनेवाला राजा दुर्योधन तुम्हारे साथ युद्धभूमिमें कैसे उतर सकता था? ।। ६ ।।

दिष्ट्या त्विदानीं सम्प्राप्त एष ते बाणगोचरम् । यथायं जीवितं जह्यात् तथा कुरु धनंजय ।। ७ ।।

धनंजय! सौभाग्यवश यह दुर्योधन इस समय तुम्हारे बाणोंके पथमें आ गया है। तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे यह अपने प्राणोंको त्याग दे ।। ७ ।।

ऐश्वर्यमदसम्मूढो नैष दुःखमुपेयिवान् । न च ते संयुगे वीर्यं जानाति पुरुषर्षभ ।। ८ ।।

पुरुषरत्न! ऐश्वर्यके घमंडमें चूर रहनेवाले इस दुर्योधनने कभी कष्ट नहीं उठाया है। यह युद्धमें तुम्हारे बल-पराक्रमको नहीं जानता है ।। ८ ।।

त्वां हि लोकास्त्रयः पार्थ ससुरासुरमानुषाः । नोत्सहन्ते रणे जेतुं किमुतैकः सुयोधनः ।। ९ ।।

पार्थ! देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोक भी रणक्षेत्रमें तुम्हें जीत नहीं सकते। फिर अकेले दुर्योधनकी तो औकात ही क्या है? ।। ९ ।।

स दिष्ट्या समनुप्राप्तस्तव पार्थ रथान्तिकम् । जह्येनं त्वं महाबाहो यथा वृत्रं पुरंदरः ।। १० ।।

कुन्तीकुमार! सौभाग्यकी बात है कि यह तुम्हारे रथके निकट आ पहुँचा है। महाबाहो! जैसे इन्द्रने वृत्रासुरको मारा था, उसी प्रकार तुम भी इस दुर्योधनको मार डालो ।। १० ।।

एष ह्यनर्थे सततं पराक्रान्तस्तवानघ । निकृत्या धर्मराजं च द्यूते वञ्चितवानयम् ।। ११ ।।

अनघ! यह सदा तुम्हारा अनर्थ करनेमें ही पराक्रम दिखाता आया है। इसने धर्मराज युधिष्ठिरको जूएमें छल-कपटसे ठग लिया है ।। ११ ।।

बहूनि सुनृशंसानि कृतान्येतेन मानद । युष्मासु पापमतिना अपापेष्वेव नित्यदा ।। १२ ।।

मानद! तुमलोग कभी इसकी बुराई नहीं करते थे, तो भी इस पापबुद्धि दुर्योधनने सदा तुमलोगोंके साथ बहुत-से क्रूरतापूर्ण बर्ताव किये हैं ।। १२ ।।

तमनार्यं सदा क्रुद्धं पुरुषं कामचारिणम् । आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा जहि पार्थविचारयन् ।। १३ ।।

पार्थ! तुम युद्धमें श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय ले बिना किसी सोच-विचारके, सदा क्रोधमें भरे रहनेवाले इस स्वेच्छाचारी दुष्ट पुरुषको मार डालो ।। १३ ।।

निकृत्या राज्यहरणं वनवासं च पाण्डव । परिक्लेशं च कृष्णाया हृदि कृत्वा पराक्रमम् ।। १४ ।।