महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 683, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुष्टिश्च ते यथापूर्वं भुजयोश्च बलं तव ॥ ७ ॥ 'भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे गाण्डीव-धनुषकी शक्ति पहले-जैसी ही है न? तुम्हारी मुट्ठी एवं बाहुबल भी पूर्ववत् हैं न? ॥ ७ ॥ न वा कच्चिदयं कालः प्राप्तः स्यादद्य पश्चिमः । तव चैवास्य शत्रोश्च तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ ८ ॥ 'आज तुम्हारी और तुम्हारे इस शत्रुकी अन्तिम भेंटका समय नहीं आया है क्या? मैं जो पूछता हूँ, उसका उत्तर दो ॥ ८ ॥ विस्मयो मे महान् पार्थ तव दृष्ट्वा शरानिमान् । व्यर्थान् निपतितान् संख्ये दुर्योधनरथं प्रति ॥ ९ ॥ 'कुन्तीनन्दन! आज युद्धस्थलमें दुर्योधनके रथके पास निष्फल होकर गिरे हुए तुम्हारे इन बाणोंको देखकर मुझे महान् आश्चर्य हो रहा है ॥ ९ ॥ वज्राशनिसमा घोराः परकायावभेदिनः । शराः कुर्वन्ति ते नार्थं पार्थ काद्य विडम्बना ॥ १० ॥ 'पार्थ! वज्र और अशनिके समान भयंकर तथा शत्रुओंके शरीरको विदीर्ण कर देनेवाले तुम्हारे वे बाण आज कुछ काम नहीं कर रहे हैं, यह कैसी विडम्बना है?' ॥ १० ॥
अर्जुन उवाच
द्रोणेनैषा मतिः कृष्ण धार्तराष्ट्रे निवेशिता । अभेद्या हि ममास्त्राणामेषा कवचधारणा ॥ ११ ॥ अर्जुन बोले— श्रीकृष्ण! मेरा तो यह विश्वास है कि दुर्योधनको द्रोणाचार्यने अभेद्य कवच बाँधकर उसमें यह अद्भुत शक्ति स्थापित कर दी है। यह कवचधारणा मेरे अस्त्रोंके लिये अभेद्य है ॥ ११ ॥ अस्मिन्नन्तर्हितं कृष्ण त्रैलोक्यमपि वर्मणि । एको द्रोणो हि वेदैतदहं तस्माच्च सत्तमात् ॥ १२ ॥ श्रीकृष्ण! इस कवचके भीतर तीनों लोकोंकी शक्ति संनिहित है। एकमात्र आचार्य द्रोण ही इस विद्याको जानते हैं और उन्हीं सद्गुरुसे सीखकर मैं भी इसे जान पाया हूँ ॥ १२ ॥ न शक्यमेतत् कवचं बाणैर्भेत्तुं कथंचन । अपि वज्रेण गोविन्द स्वयं मघवता युधि ॥ १३ ॥ इस कवचको किसी प्रकार बाणोंद्वारा विदीर्ण नहीं किया जा सकता। गोविन्द! युद्धस्थलमें साक्षात् देवराज इन्द्र अपने वज्रसे भी इसका विदारण नहीं कर सकते ॥ १३ ॥ जानंस्त्वमपि वै कृष्ण मां विमोहयसे कथम् । यद् वृत्तं त्रिषु लोकेषु यच्च केशव वर्तते ॥ १४ ॥ तथा भविष्यद् यच्चैव तत् सर्वं विदितं तव ।