महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउनकी वे पताकाएँ वायुसे संचालित हो रंगमंचपर नृत्य करनेवाली विलासिनियोंके समान दिखायी देती थीं ॥ इन्द्रायुधसवर्णाभाः पताका भरतर्षभ ।। ७ ।। दोधूयमाना रथिनां शोभयन्ति महारथान् । भरतश्रेष्ठ! इन्द्रधनुषके समान प्रभाव़ाली फहराती हुई पताकाएँ रथियोंके विशाल रथोंकी शोभा बढ़ाती थीं ।। सिंहलाङ्गूलमुग्रास्यं ध्वजं वानरलक्षणम् ।। ८ ।। धनंजयस्य संग्रामे प्रत्यदृश्यत भैरवम् । उस संग्राममें अर्जुनका भयंकर ध्वज वानरके चिह्नसे सुशोभित दिखायी देता था। उस वानरकी पूँछ सिंहके समान थी और उसका मुख बड़ा ही उग्र था ।। ८ १/२ ।। स वानरवरो राजन् पताकाभिरलंकृतः ।। ९ ।। त्रासयामास तत् सैन्यं ध्वजो गाण्डीवधन्वनः । राजन्! श्रेष्ठ वानरसे सुशोभित तथा पताकाओंसे अलंकृत गाण्डीवधारी अर्जुनका वह ध्वज आपकी उस सेनाको भयभीत किये देता था ।। ९ १/२ ।। तथैव सिंहलाङ्गूलं द्रोणपुत्रस्य भारत ।। १० ।। ध्वजाग्रं समपश्याम बालसूर्यसमप्रभम् । भारत! इसी प्रकार हमलोगोंने द्रोणपुत्र अश्वत्थामा-के श्रेष्ठ ध्वजको प्रातःकालीन सूर्यके समान अरुण कान्तिसे प्रकाशित देखा था। उसमें सिंहकी पूँछका चिह्न था ।। १० १/२ ।। काञ्चनं पवनोद्धूतं शक्रध्वजसमप्रभम् ।। ११ ।। नन्दनं कौरवेन्द्राणां द्रौणेर्लक्ष्म समुच्छ्रितम् । अश्वत्थामाका इन्द्रध्वजके समान प्रकाशमान सुवर्णमय ऊँचा ध्वज वायुकी प्रेरणासे फहराता हुआ कौरव-नरेशोंका आनन्द बढ़ा रहा था ।। ११ १/२ ।। हस्तिकक्ष्या पुनर्हैमी बभूवाधिरथेर्ध्वजः ।। १२ ।। आहवे खं महाराज ददृशे पूरयन्निव । अधिरथपुत्र कर्णका ध्वज हाथीकी सुवर्णमयी रस्सीके चिह्नसे युक्त था। महाराज! वह संग्राममें आकाशको भरता हुआ-सा दिखायी देता था ।। १२ १/२ ।। पताका काञ्चनी स्रग्वी ध्वजे कर्णस्य संयुगे ।। १३ ।। नृत्यतीव रथोपस्थे श्वसनेन समीरिता । युद्धस्थलमें कर्णके ध्वजपर सुवर्णमयी मालासे विभूषित पताका वायुसे आन्दोलित हो रथकी बैठकपर नृत्य-सा कर रही थी ।। १३ १/२ ।। आचार्यस्य तु पाण्डूनां ब्राह्मणस्य तपस्विनः ।। १४ ।।