महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 701, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतमभ्ययाद् बृहत्क्षत्रः केकयानां महारथः । प्रवपन् निशितान् बाणान् महेन्द्राशनिसंनिभान् ॥ ७ ॥ केकयदेशके महारथी वीर बृहत्क्षत्रने महेन्द्रके वज्रके समान तीखे बाणोंकी वर्षा करते हुए वहाँ द्रोणाचार्यपर धावा किया ॥ ७ ॥ तं तु प्रत्युद्ययौ शीघ्रं क्षेमधूर्तिर्महायशाः । विमुञ्चन् निशितान् बाणान् शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ८ ॥ उस समय महायशस्वी क्षेमधूर्ति सैकड़ों और हजारों तीखे बाण छोड़ते हुए शीघ्रतापूर्वक बृहत्क्षत्रका सामना करनेके लिये गये ॥ ८ ॥ धृष्टकेतुश्च चेदीनामृषभोऽतिबलोदितः । त्वरितोऽभ्यद्रवद् द्रोणं महेन्द्र इव शम्बरम् ॥ ९ ॥ अत्यन्त बलसे विख्यात चेदिराज धृष्टकेतुने भी बड़ी उतावलीके साथ द्रोणाचार्यपर धावा किया, मानो देवराज इन्द्रने शम्बरासुरपर चढ़ाई की हो ॥ ९ ॥ तमापतन्तं सहसा व्यादितास्यमिवान्तकम् । वीरधन्वा महेष्वासस्त्वरमाणः समभ्ययात् ॥ १० ॥ मुँह बाये हुए कालके समान सहसा आक्रमण करनेवाले धृष्टकेतुका सामना करनेके लिये महाधनुर्धर वीरधन्वा बड़े वेगसे आ पहुँचे ॥ १० ॥ युधिष्ठिरं महाराजं जिगीषुं समवस्थितम् । सहानीकं ततो द्रोणो न्यवारयत वीर्यवान् ॥ ११ ॥ तदनन्तर पराक्रमी द्रोणाचार्यने विजयकी इच्छासे सेनासहित खड़े हुए महाराज युधिष्ठिरको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ११ ॥ नकुलं कुशलं युद्धे पराक्रान्तं पराक्रमी । अभ्यगच्छत् समायान्तं विकर्णस्ते सुतः प्रभो ॥ १२ ॥ प्रभो! आपके पराक्रमी पुत्र विकर्णने वहाँ आते हुए पराक्रमशाली युद्धकुशल नकुलका सामना किया ॥ सहदेवं तथाऽऽयान्तं दुर्मुखः शत्रुकर्षणः । शरैरनेकसाहस्रैः समवाकिरदाशुगैः ॥ १३ ॥ शत्रुसूदन दुर्मुखने अपने सामने आते हुए सहदेवपर कई हजार बाणोंकी वर्षा की ॥ १३ ॥ सात्यकिं तु नरव्याघ्रं व्याघ्रदत्तस्त्ववारयत् । शरैः सुनिशितैस्तीक्ष्णैः कम्पयन् वै मुहुर्मुहुः ॥ १४ ॥ व्याघ्रदत्तने अत्यन्त तेज किये हुए तीखे बाणोंद्वारा बारंबार शत्रुसेनाको कम्पित करते हुए वहाँ पुरुषसिंह सात्यकिको आगे बढ़नेसे रोका ॥ १४ ॥ द्रौपदेयान् नरव्याघ्रान् मुञ्चतः सायकोत्तमान् ।