भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 703

शरैरनेकसाहस्रैः पूरयामास सर्वतः ॥ २३ ॥ धनुष काट देनेके पश्चात् महारथी द्रोणाचार्यने बड़ी उतावलीके साथ कई हजार बाणोंकी वर्षा करके उन्हें सब ओरसे ढक दिया ॥ २३ ॥

अदृश्यं वीक्ष्य राजानं भारद्वाजस्य सायकैः । सर्वभूतान्यमन्यन्त हतमेव युधिष्ठिरम् ॥ २४ ॥ राजा युधिष्ठिरको द्रोणाचार्यके बाणोंसे अदृश्य हुआ देख समस्त प्राणियोंने उन्हें मारा गया ही मान लिया ॥ २४ ॥

केचिच्चैनममन्यन्त तथैव विमुखीकृतम् । हतो राजेति राजेन्द्र ब्राह्मणेन महात्मना ॥ २५ ॥ राजेन्द्र! कुछ लोग ऐसा समझते थे कि युधिष्ठिर पराजित होकर भाग गये। कुछ लोगोंकी यही धारणा थी कि महामनस्वी ब्राह्मण द्रोणाचार्यके हाथसे राजा युधिष्ठिर मार डाले गये ॥ २५ ॥

स कृच्छ्रं परमं प्राप्तो धर्मराजो युधिष्ठिरः । त्यक्त्वा तत् कार्मुकं छिन्नं भारद्वाजेन संयुगे ॥ २६ ॥ आददेऽन्यद् धनुर्दिव्यं भास्वरं वेगवत्तरम् । इस प्रकार भारी संकटमें पड़े हुए धर्मराज युधिष्ठिरने युद्धमें द्रोणाचार्यके द्वारा काट दिये गये उस धनुषको त्यागकर दूसरा प्रकाशमान एवं अत्यन्त वेगशाली दिव्य धनुष धारण किया ॥ २६ १/२ ॥

ततस्तान् सायकांस्तत्र द्रोणनुन्नान् सहस्रशः ॥ २७ ॥ चिच्छेद समरे वीरस्तदद्भुतमिवाभवत् । तदनन्तर वीर युधिष्ठिरने समरांगणमें द्रोणाचार्यके चलाये हुए सहस्रों बाणोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। वह अद्भुत-सी बात हुई ॥ २७ १/२ ॥

छित्त्वा तु तान् शरान् राजन् क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ २८ ॥ शक्तिं जग्राह समरे गिरीणामपि दारिणीम् । स्वर्णदण्डां महाघोरामष्टघण्टां भयावहाम् ॥ २९ ॥ राजन्! उस समरांगणमें क्रोधसे लाल आँखें किये युधिष्ठिरने द्रोणके उन बाणोंको काटकर एक शक्ति हाथमें ली, जो पर्वतोंको भी विदीर्ण कर देनेवाली थी। उसमें सोनेका डंडा और आठ घंटियाँ लगी थीं। वह अत्यन्त घोर शक्ति मनमें भय उत्पन्न करनेवाली थी ॥

समुत्क्षिप्य च तां हृष्टो ननाद बलवद् बली । नादेन सर्वभूतानि त्रासयन्निव भारत ॥ ३० ॥ भारत! उसे चलाकर हर्षमें भरे हुए बलवान् युधिष्ठिरने बड़े जोरसे सिंहनाद किया। उन्होंने उस सिंहनादसे सम्पूर्ण भूतोंमें भय-सा उत्पन्न कर दिया ॥

शक्तिं समुद्यतां दृष्ट्वा धर्मराजेन संयुगे ।