महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 711, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंफिर दूसरे पानीदार एवं तीखे भल्लसे उसके सारथिके चमकीले कुण्डलवाले मस्तकको धड़से काट गिराया ।। क्षुरप्रेण च तीक्ष्णेन कौरव्यस्य महद् धनुः । सहदेवो रणे छित्त्वा तं च विव्याध पञ्चभिः ।। २४ ।। तत्पश्चात् सहदेवने तीखे क्षुरप्रसे समरांगणमें दुर्मुखके विशाल धनुषको काटकर उसे भी पाँच बाणोंसे घायल कर दिया ।। २४ ।। हताश्वं तु रथं त्यक्त्वा दुर्मुखो विमनास्तदा । आरुरोह रथं राजन् निरमित्रस्य भारत ।। २५ ।। राजन्! भरतनन्दन! तब दुर्मुख दुःखी मनसे उस अश्वहीन रथको त्यागकर निरमित्रके रथपर जा चढ़ा ।। सहदेवस्ततः क्रुद्धो निरमित्रं महाहवे । जघान पृतनामध्ये भल्लेन परवीरहा ।। २६ ।। इससे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सहदेव कुपित हो उठे और उन्होंने उस महासमरमें सेनाके बीचोबीच एक भल्लसे निरमित्रको मार डाला ।। २६ ।। स पपात रथोपस्थात्निरमित्रो जनेश्वरः । त्रिगर्तराजस्य सुतो व्यथयंस्तव वाहिनीम् ।। २७ ।। त्रिगर्तराजका पुत्र राजा निरमित्र अपने वियोगसे आपकी सेनाको व्यथित करता हुआ रथकी बैठकसे नीचे गिर पड़ा ।। २७ ।। तं तु हत्वा महाबाहुः सहदेवो व्यरोचत । यथा दाशरथी रामः खरं हत्वा महाबलम् ।। २८ ।। जैसे पूर्वकालमें दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम महाबली खरका वध करके सुशोभित हुए थे, उसी प्रकार महाबाहु सहदेव निरमित्रको मारकर शोभा पा रहे थे ।। २८ ।। हाहाकारो महानासीत् त्रिगर्तानां जनेश्वर । राजपुत्रं हतं दृष्ट्वा निरमित्रं महारथम् ।। २९ ।। नरेश्वर! महारथी राजकुमार निरमित्रको मारा गया देख त्रिगर्तोंके दलमें महान् हाहाकार मच गया ।। २९ ।। नकुलस्ते सुतं राजन् विकर्णं पृथुलोचनम् । मुहूर्ताज्जितवाँल्लोके तदद्भुतमिवाभवत् ।। ३० ।। राजन्! नकुलने विशाल नेत्रोंवाले आपके पुत्र विकर्णको दो ही घड़ीमें पराजित कर दिया; यह अद्भुत-सी बात हुई ।। ३० ।। सात्यकिं व्याघ्रदत्तस्तु शरैः संनतपर्वभिः । चक्रेऽदृश्यं साश्वसूतं सध्वजं पृतनान्तरे ।। ३१ ।।