महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 723, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंरुषिताः पन्नगा यद्वद् गिरिशृङ्गं महाबलाः ।
जैसे रोषमें भरे हुए महाबली सर्प पर्वतसे शिखरपर चढ़ जाते हैं, उसी प्रकार अलम्बुषके वे झुकी हुई गाँठवाले बाण उस समय घटोत्कचके शरीरमें घुस गये ।। २२ १/२ ।।
ततस्ते पाण्डवा राजन् समन्तान्निशितान् शरान् ।। २३ ।।
प्रेषयामासुरुद्विग्ना हैडिम्बश्च घटोत्कचः ।
राजन्! तदनन्तर पाण्डव तथा हिडिम्बाकुमार घटोत्कच—सबने उद्विग्न होकर सब ओरसे अलम्बुषपर पैने बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ।। २३ १/२ ।।
स विध्यमानः समरे पाण्डवैर्जितकाशिभिः ।। २४ ।।
मर्त्यधर्ममनुप्राप्तः कर्तव्यं नान्वपद्यत ।
विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डवोंद्वारा समरभूमिमें विद्ध होकर मर्त्यधर्मको प्राप्त हुए अलम्बुषसे कुछ भी करते न बना ।। २४ १/२ ।।
ततः समरशौण्डो वै भैमसैनिर्महाबलः ।। २५ ।।
समीक्ष्य तदवस्थं तं वधायास्य मनो दधे ।
तब समरकुशल महाबली भीमसेनकुमारने अलम्बुषको उस अवस्थामें देखकर मन-ही-मन उसके वधका निश्चय किया ।। २५ १/२ ।।
वेगं चक्रे महान्तं च राक्षसेन्द्ररथं प्रति ।। २६ ।।
दग्धाद्रिकूटशृङ्गाभं भिन्नाञ्जनचयोपमम् ।
उसने जले हुए पर्वतशिखर तथा कटे-छटे कोयलेके पहाड़के समान प्रतीत होनेवाले राक्षसराज अलम्बुषके रथपर पहुँचनेके लिये महान् वेग प्रकट किया ।। २६ १/२ ।।
रथाद् रथमभिद्रुत्य क्रुद्धो हैडिम्बिराक्षिपत् ।। २७ ।।
उद्बबर्ह रथाच्चापि पन्नगं गरुडो यथा ।
क्रोधमें भरे हुए हिडिम्बाकुमारने अपने रथसे अलम्बुषके रथपर कूदकर उसे पकड़ लिया और जैसे गरुड़ सर्पको टाँग लेता है, उसी प्रकार उसने भी अलम्बुषको रथसे उठा लिया ।। २७ १/२ ।।
समुत्क्षिप्य च बाहुभ्यामाविध्य च पुनः पुनः ।। २८ ।।
निष्पिपेष क्षितौ क्षिप्रं पूर्णकुम्भमिवाश्मनि ।
दोनों भुजाओंसे अलम्बुषको ऊपर उठाकर घटोत्कचने बारंबार घुमाया और जैसे जलसे भरे हुए घड़ेको पत्थरपर पटक दिया जाय, उसी प्रकार उसे शीघ्र ही पृथ्वीपर दे मारा ।। २८ १/२ ।।
बललाघवसम्पन्नः सम्पन्नो विक्रमेण च ।। २९ ।।
भैमसैनी रणे क्रुद्धः सर्वसैन्यान्यभीषयत् ।