महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 726, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशाधिकशततमोऽध्यायः
द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश
धृतराष्ट्र उवाच
भारद्वाजं कथं युद्धे युयुधानो न्यवारयत् ।
संजयाचक्ष्व तत्त्वेन परं कौतूहलं हि मे ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा— संजय! सात्यकिने युद्धमें द्रोणाचार्यको किस प्रकार रोका? यह यथार्थरूपसे बताओ। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें महान् कौतूहल हो रहा है ॥ १ ॥
संजय उवाच
शृणु राजन् महाप्राज्ञ संग्रामं लोमहर्षणम् ।
द्रोणस्य पाण्डवैः सार्धं युयुधानपुरोगमैः ॥ २ ॥
संजयने कहा— राजन्! महामते! द्रोणाचार्यका सात्यकि आदि पाण्डव-योद्धाओंके साथ जो रोमांचकारी संग्राम हुआ था, उसका वर्णन सुनिये ॥ २ ॥
वध्यमानं बलं दृष्ट्वा युयुधानेन मारिष ।
अभ्यद्रवत् स्वयं द्रोणः सात्यकिं सत्यविक्रमम् ॥ ३ ॥
माननीय नरेश! द्रोणाचार्यने जब अपनी सेनाको युयुधानके द्वारा पीड़ित होते देखा, तब वे सत्यपराक्रमी सात्यकिपर स्वयं ही टूट पड़े ॥ ३ ॥
तमापतन्तं सहसा भारद्वाजं महारथम् ।
सात्यकिः पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समर्पयत् ॥ ४ ॥
उस समय सहसा आते हुए महारथी द्रोणाचार्यको सात्यकिने पचीस बाण मारे ॥ ४ ॥
द्रोणोऽपि युधि विक्रान्तो युयुधानं समाहितः ।
अविध्यत् पञ्चभिस्तूर्णं हेमपुङ्खैः शरैः शितैः ॥ ५ ॥
तब पराक्रमी द्रोणाचार्यने भी युद्धस्थलमें एकाग्रचित्त हो तुरंत ही सोनेके पंखवाले पाँच पैने बाणोंद्वारा युयुधानको घायल कर दिया ॥ ५ ॥
ते वर्म भित्त्वा सुदृढं द्विषत्पिशितभोजनाः ।
अभ्ययुर्धरणीं राजन् श्वसन्त इव पन्नगाः ॥ ६ ॥
राजन्! द्रोणाचार्यके बाण शत्रुओंके मांस खानेवाले थे। वे सात्यकिके सुदृढ़ कवचको छिन्न-भिन्न करके फुफकारते हुए सर्पोंके समान धरतीमें समा गये ॥ ६ ॥
दीर्घबाहुरभिक्रुद्धस्तोत्रार्दित इव द्विपः ।