महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 729, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंआतिथेयं गृहं प्राप्य नृपतेऽतिथयो यथा ॥ २४ ॥ राजन्! जैसे घरपर आये हुए अतिथियोंका जल और आसन आदिके द्वारा सत्कार किया जाता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यने स्वयं उन समस्त आक्रमणकारी वीरोंकी मुसकराते हुए ही अगवानी की। जैसे अतिथिसत्कारमें निपुण गृहस्थके घर जाकर अतिथि तृप्त होते हैं, उसी प्रकार धनुर्धर द्रोणाचार्यके बाणोंसे उन सबकी यथेष्ट तृप्ति की गयी ॥ २३-२४ ॥
भारद्वाजं च ते सर्वे न शेकुः प्रतीविक्षितुम् । मध्यंदिनमनुप्राप्तं सहस्रांशुमिव प्रभो ॥ २५ ॥ प्रभो! जैसे दोपहरके प्रचण्ड मार्तण्डकी ओर देखना कठिन होता है, उसी प्रकार वे समस्त योद्धा भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यकी ओर देखनेमें भी समर्थ न हो सके ॥ २५ ॥
तांस्तु सर्वान् महेष्वासान् द्रोणः शस्त्रभृतां वरः । अतापयच्छरव्रतैर्गभस्तिभिरिवांशुमान् ॥ २६ ॥ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य उन समस्त महाधनुर्धरोंको अपने बाणसमूहोंद्वारा उसी प्रकार संतप्त करने लगे, जैसे अंशुमाली सूर्य अपनी किरणोंसे जगत्को संताप देते हैं ॥ २६ ॥
वध्यमाना महाराज पाण्डवाः सृञ्जयास्तथा । त्रातारं नाध्यगच्छन्त पङ्कमग्ना इव द्विपाः ॥ २७ ॥ महाराज! उस समय द्रोणाचार्यकी मार खाते हुए पाण्डव और सृंजय सैनिक कीचड़में फँसे हुए हाथियोंके समान कोई रक्षक न पा सके ॥ २७ ॥
द्रोणस्य च व्यदृश्यन्त विसर्पन्तो महाशराः । गभस्तय इवार्कस्य प्रतपन्तः समन्ततः ॥ २८ ॥ जैसे सूर्यकी किरणें सब ओर ताप प्रदान करती हुई फैल जाती हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्यके विशाल बाण सब ओर फैलते और शत्रुओंको संतप्त करते दिखायी देते थे ॥ २८ ॥
तस्मिन् द्रोणेन निहताः पञ्चालाः पञ्चविंशतिः । महारथाः समाख्याता धृष्टद्युम्नस्य सम्मताः ॥ २९ ॥ उस युद्धमें द्रोणाचार्यके द्वारा पांचालोंके पचीस सुप्रसिद्ध महारथी मारे गये जो धृष्टद्युम्नको बहुत ही प्रिय थे ॥ २९ ॥
पाण्डूनां सर्वसैन्येषु पञ्चालानां तथैव च । द्रोणं स्म ददृशुः शूरं विनिघ्नन्तं वरान् वरान् ॥ ३० ॥ लोगोंने देखा, पाण्डवों और पांचालोंकी समस्त सेनाओंमें जो मुख्य-मुख्य योद्धा हैं, उन्हें शूरवीर द्रोणाचार्य चुन-चुनकर मार रहे हैं ॥ ३० ॥
केकयानां शतं हत्वा विद्राव्य च समन्ततः । द्रोणस्तस्थौ महाराज व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ३१ ॥