महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतात! शिनिप्रवर! धर्मात्मा अर्जुन तुम्हारा गुरु है तथा भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हारे और बुद्धिमान् अर्जुनके भी गुरु हैं ।। ९९ १/२ ।।
कारणद्वयमेतद्धि जानंस्वामहमनुब्रुवम् ।। १०० ।।
मावमंस्था वचो मह्यं गुरुस्तव गुरोर्ह्यहम् ।
इन दोनों कारणोंको जानकर मैं तुमसे इस कार्यके लिये कह रहा हूँ। तुम मेरी बातकी अवहेलना न करो; क्योंकि मैं तुम्हारे गुरुका भी गुरु हूँ ।। १०० १/२ ।।
वासुदेवमतं चैव मम चैवार्जुनस्य च ।। १०१ ।।
सत्यमेतन्मयोक्तं ते याहि यत्र धनंजयः ।
तुम्हारा वहाँ जाना भगवान् श्रीकृष्णको, मुझको तथा अर्जुनको भी प्रिय है। यह मैंने तुमसे सच्ची बात कही है। अतः जहाँ अर्जुन है, वहाँ जाओ ।। १०१ १/२ ।।
एतद् वचनमाज्ञाय मम सत्यपराक्रम ।। १०२ ।।
प्रविशैतद् बलं तात धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ।
सत्यपराक्रमी वत्स! तुम मेरी इस बातको मानकर दुर्बुद्धि दुर्योधनकी इस सेनामें प्रवेश करो ।। १०२ १/२ ।।
प्रविश्य च यथान्यायं संगम्य च महारथैः ।
यथार्हमात्मनः कर्म रणे सात्वत दर्शय ।। १०३ ।।
सात्वत! इसमें प्रवेश करके यथायोग्य सब महारथियोंसे मिलकर युद्धमें अपने अनुरूप पराक्रम दिखाओ ।। १०३ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये दशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें युधिष्ठिरवाक्यविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १०५ श्लोक हैं)