भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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रुद्राणामिव कापाली वसूनामिव पावकः । कुबेर इव यक्षाणां मरुतामिव वासवः ।। ५ ।। वसिष्ठ इव विप्राणां तेजसामिव भास्करः । पितॄणामिव धर्मेन्द्रो यादसामिव चाम्बुराट् ।। ६ ।। नक्षत्राणामिव शशी दितिजानामिवोशनाः । श्रेष्ठः सेनाप्रणेतॄणां स नः सेनापतिर्भव ।। ७ ।। रुद्रोंमें शंकर, वसुओंमें पावक, यक्षोंमें कुबेर, देवताओंमें इन्द्र, ब्राह्मणोंमें वसिष्ठ, तेजोमय पदार्थोंमें भगवान् सूर्य, पितरोंमें धर्मराज, जलचरोंमें वरुणदेव, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा और दैत्योंमें शुक्राचार्यके समान आप समस्त सेनानायकोंमें श्रेष्ठ हैं; अतः हमारे सेनापति होइये ।। अक्षौहिण्यो दशैका च वशगाः सन्तु तेऽनघ । ताभिः शत्रून् प्रतव्यूह्य जहीन्द्रो दानवानिव ।। ८ ।। अनघ! मेरी ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ आपके अधीन रहें। उन सबके द्वारा शत्रुओंके मुकाबलेमें व्यूह बनाकर आप मेरे विरोधियोंका उसी प्रकार नाश कीजिये, जैसे इन्द्र

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