भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 746

समासादयितुं शक्तो न च मां धर्षयिष्यति । सेनासहित द्रोणाचार्य तथा कृतवर्मा—ये युद्धस्थलमें मेरे पास नहीं पहुँच सकते और न मुझे परास्त ही कर सकेंगे ॥ ४७ १/२ ॥ धृष्टद्युम्नश्च समरे द्रोणं क्रुद्धं परंतपः ॥ ४८ ॥ वारयिष्यति विक्रम्य वेलेव मकरालयम् । शत्रुओंको संताप देनेवाला धृष्टद्युम्न समरांगणमें कुपित हुए द्रोणाचार्यको पराक्रम करके रोक लेगा। ठीक वैसे ही, जैसे तटकी भूमि समुद्रको आगे बढ़नेसे रोक देती है ॥ ४८ १/२ ॥ यत्र स्थास्यति संग्रामे पार्षतः परवीरहा ॥ ४९ ॥ द्रोणो न सैन्यं बलवत् क्रामेत् तत्र कथंचन । जहाँ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला द्रुपदकुमार संग्रामभूमिमें खड़ा होगा, वहाँ मेरी प्रबल सेनापर द्रोणाचार्य किसी तरह आक्रमण नहीं कर सकते ॥ एष द्रोणविनाशाय समुत्पन्नो हुताशनात् ॥ ५० ॥ कवची स शरी खड्गी धन्वी च वरभूषणः । यह धृष्टद्युम्न, द्रोणाचार्यका नाश करनेके लिये कवच, धनुष, बाण, खड्ग और श्रेष्ठ आभूषणोंके साथ अग्निसे प्रकट हुआ है ॥ ५० १/२ ॥ विश्रब्धं गच्छ शैनेय मा कार्षीर्मयि सम्भ्रमम् । धृष्टद्युम्नो रणे क्रुद्धं द्रोणमावारयिष्यति ॥ ५१ ॥ अतः शिनिनन्दन! तुम निश्चिन्त होकर जाओ। मेरे लिये संदेह मत करो। धृष्टद्युम्न रणक्षेत्रमें कुपित हुए द्रोणाचार्यको सर्वथा रोक देगा ॥ ५१ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि युधिष्ठिरसात्यकिवाक्ये एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें युधिष्ठिर और सात्यकिका संवादविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १११ ॥