महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 748, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्वत्कृते न च मे किंचिदकर्तव्यं कथंचन ॥ ६ ॥ ‘मानद! मैं आपके आदेश और संदेशसे अर्जुनके पथका अनुसरण करूँगा। आपके लिये कोई ऐसा कार्य नहीं है जिसे मैं किसी प्रकार न कर सकूँ ॥ ६ ॥
यथा हि मे गुरोर्वाक्यं विशिष्टं द्विपदां वर । तथा तवापि वचनं विशिष्टतरमेव मे ॥ ७ ॥ ‘नरश्रेष्ठ! मेरे गुरु अर्जुनका वचन मेरे लिये जैसा महत्त्व रखता है, आपका वचन भी वैसा ही है, बल्कि उससे भी बढ़कर है ॥ ७ ॥
प्रिये हि तव वर्तेते भ्रातरौ कृष्णपाण्डवौ । तयोः प्रिये स्थितं चैव विद्धि मां राजपुङ्गव ॥ ८ ॥ ‘नृपश्रेष्ठ! दोनों भाई श्रीकृष्ण और अर्जुन आपके प्रिय साधनमें लगे हुए हैं और उन दोनोंके प्रिय कार्यमें आप मुझे तत्पर जानिये ॥ ८ ॥
तवाज्ञां शिरसा गृह्य पाण्डवार्थमहं प्रभो । भित्त्वेदं दुर्भिदं सैन्यं प्रयास्ये नरपुङ्गव ॥ ९ ॥ ‘प्रभो! नरश्रेष्ठ! मैं आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके पाण्डुनन्दन अर्जुनके लिये इस दुर्भेद्य सैन्यव्यूहका भेदनकर उनके पास जाऊँगा ॥ ९ ॥
द्रोणानीकं विशाम्येष क्रुद्धो झष इवार्णवम् । तत्र यास्यामि यत्रासौ राजन् राजा जयद्रथः ॥ १० ॥ ‘राजन्! जैसे महामत्स्य महासागरमें प्रवेश करता है, उसी प्रकार मैं भी कुपित होकर द्रोणाचार्यकी सेनामें घुसता हूँ। मैं वहीं जाऊँगा जहाँ राजा जयद्रथ है ॥ १० ॥
यत्र सेनां समाश्रित्य भीतस्तिष्ठति पाण्डवात् । गुप्तो रथवरश्रेष्ठैर्द्रौणिकर्णकृपादिभिः ॥ ११ ॥ ‘पाण्डुनन्दन अर्जुनसे भयभीत हो अपनी सेनाका आश्रय लेकर जयद्रथ जहाँ अश्वत्थामा, कर्ण और कृपाचार्य आदि श्रेष्ठ महारथियोंसे सुरक्षित होकर खड़ा है वहीं मुझे पहुँचना है ॥ ११ ॥
इतस्त्रियोजनं मन्ये तमध्वानं विशाम्पते । यत्र तिष्ठति पार्थोऽसौ जयद्रथवधोद्यतः ॥ १२ ॥ ‘प्रजापालक नरेश! इस समय जहाँ जयद्रथ-वधके लिये उद्यत हुए अर्जुन खड़े हैं, उस स्थानको मैं यहाँसे तीन योजन दूर मानता हूँ ॥ १२ ॥
त्रियोजनगतस्यापि तस्य यास्याम्यहं पदम् । आसैन्धववधाद् राजन् सुदृढेनान्तरात्मना ॥ १३ ॥ ‘राजन्! अर्जुनके तीन योजन दूर चले जानेपर भी मैं जयद्रथ-वधके पहले ही सुदृढ़ हृदयसे अर्जुनके स्थानपर पहुँच जाऊँगा ॥ १३ ॥