महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 761, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंऊरुभिः पृथिवी च्छन्ना मनुजानां नराधिप । माननीय नरेश! सारे कौरव-सैनिक सात्यकिके तेजसे मोहित हो अकेले होनेपर भी उन्हें अनेक रूपोंमें देखने लगे। वहाँ बहुसंख्यक रथ चूर-चूर हो गये थे। उनकी बैठकें टूट-फूट गयी थीं। पहियोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। छत्र और ध्वज छिन्न-भिन्न होकर धरतीपर पड़े थे। अनुकर्ष, पताका, शिरस्त्राण, सुवर्णभूषित अंगदयुक्त चन्दनचर्चित भुजाएँ, हाथीकी सूँड़ तथा सर्पोंके शरीरके समान मोटे-मोटे ऊरु सब ओर बिखरे पड़े थे। नरेश्वर! मनुष्योंके विभिन्न अंगों तथा रथके पूर्वोक्त अवयवोंसे वहाँकी भूमि आच्छादित हो गयी थी ।। १३—१५ ½ ।।
शशाङ्कसंनिभैश्चैव वदनैश्चारुकुण्डलैः ।। १६ ।। पतितैर्ऋषभाक्षाणां सा बभावति मेदिनी । वृषभके समान बड़े-बड़े नेत्रोंवाले वीरोंके गिरे हुए मनोहर कुण्डलमण्डित चन्द्रमा-जैसे मुखोंसे वहाँकी भूमि अत्यन्त शोभा पा रही थी ।। १६ ½ ।।
गजैश्च बहुधा छिन्नैः शयानैः पर्वतोपमैः ।। १७ ।। रराजातिभृशं भूमिविकीर्णैरिव पर्वतैः । अनेकों टुकड़ोंमें कटकर धराशायी हुए पर्वताकार गजराजोंसे वहाँकी भूमि इस प्रकार अत्यन्त शोभासम्पन्न हो रही थी, मानो वहाँ बहुत-से पर्वत बिखरे हुए हों ।।
तपनीयमयैर्योक्त्रैर्मुक्ताजालविभूषितैः ।। १८ ।। उरश्छदैर्विचित्रैश्च व्यशोभन्त तुरङ्गमाः । गतसत्त्वा महीं प्राप्य प्रमृष्टा दीर्घबाहुना ।। १९ ।। कितने ही घोड़े सुनहरी रस्सियों तथा मोतीकी जालियोंसे विभूषित विचित्र आच्छादन वस्त्रोंसे विशेष शोभायमान हो रहे थे। महाबाहु सात्यकिके द्वारा रौंदे जाकर वे धरतीपर पड़े थे और उनके प्राण-पखेरू उड़ गये ।। १८-१९ ।।
नानाविधानि सैन्यानि तव हत्वा तु सात्वतः । प्रविष्टस्तावकं सैन्यं द्रावयित्वा चमूं भृशम् ।। २० ।। इस प्रकार आपकी नाना प्रकारकी सेनाओंका संहार करके तथा बहुत-से सैनिकोंको भगाकर सात्यकि आपकी सेनाके भीतर घुस गये ।। २० ।।
ततस्तेनैव मार्गेण येन यातो धनंजयः । इयेष सात्यकिर्गन्तुं ततो द्रोणेन वारितः ।। २१ ।। तदनन्तर जिस मार्गसे अर्जुन गये, उसीसे सात्यकिने भी जानेका विचार किया; परंतु द्रोणाचार्यने उन्हें रोक दिया ।। २१ ।।
भारद्वाजं समासाद्य युयुधानश्च सात्यकिः । न न्यवर्तत संक्रुद्धो वेलामिव जलाशयः ।। २२ ।।