महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 767, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंन चचाल तदा राजन् सात्यकिः सत्यविक्रमः । राजेन्द्र! यही अवसर पाकर सात्यकि वहाँसे आगे निकल गये। तब कृतवर्माने भीमसेनपर धावा किया। कृतवर्माकी सेनासे निकलकर युयुधान तुरंत ही काम्बोजोंकी विशाल वाहिनीके पास आ पहुँचे। वहाँ बहुत-से शूरवीर महारथियोंने उन्हें आगे बढ़नेसे रोक दिया। महाराज! तो भी उस समय सत्यपराक्रमी सात्यकि विचलित नहीं हुए ॥ ६०-६१ १/२ ॥
संधाय च चमूं द्रोणो भोजे भारं निवेश्य च ॥ ६२ ॥ अभ्यधावद् रणे यत्तो युयुधानं युयुत्सया । द्रोणाचार्यने अपनी बिखरी हुई सेनाको एकत्र करके उसकी रक्षाका भार कृतवर्माको सौंपकर समरांगणमें सात्यकिके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे उद्यत हो उनके पीछे-पीछे दौड़े ॥ ६२ १/२ ॥
तथा तमनुधावन्तं युयुधानस्य पृष्ठतः ॥ ६३ ॥ न्यवारयन्त संहृष्टाः पाण्डुसैन्ये बृहत्तमाः । इस प्रकार उन्हें युयुधानके पीछे दौड़ते देख पाण्डव-सेनाके प्रमुख वीर हर्षमें भरकर द्रोणाचार्यको रोकनेका प्रयत्न करने लगे ॥ ६३ १/२ ॥
समासाद्य तु हार्दिक्यं रथानां प्रवरं रथम् ॥ ६४ ॥ पञ्चाला विगतोत्साहा भीमसेनपुरोगमाः । परंतु रथियोंमें श्रेष्ठ महारथी कृतवर्माके पास पहुँचकर भीमसेनको आगे करके आक्रमण करनेवाले पांचालोंका उत्साह नष्ट हो गया ॥ ६४ १/२ ॥
विक्रम्य वारिता राजन् वीरेण कृतवर्मणा ॥ ६५ ॥ यतमानांश्च तान् सर्वानीषद्विगतचेतसः । अभितस्तान् शरौघेण क्लान्तवाहानकारयत् ॥ ६६ ॥ राजन्! वीर कृतवर्माने पराक्रम करके उनको रोक दिया। वे सभी वीर कुछ-कुछ शिथिल एवं अचेत-से हो रहे थे तो भी अपनी विजयके लिये प्रयत्नशील थे; परंतु कृतवर्माने सब ओरसे उनके ऊपर बाणसमूहोंकी वर्षा करके उनके वाहनोंको व्याकुल कर दिया ॥ ६५-६६ ॥
निगृहीतास्तु भोजेन भोजानीकेप्सवो रणे । अतिष्ठन्नार्यवद् वीराः प्रार्थयन्तो महद्यशः ॥ ६७ ॥ कृतवर्माद्वारा रोके जानेपर वे पाण्डव वीर रणक्षेत्रमें महान् यशकी इच्छा करते हुए उसीकी सेनाके साथ युद्धकी अभिलाषा करके श्रेष्ठ पुरुषोंके समान डटकर खड़े हो गये ॥ ६७ ॥