भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 776

वासुदेवस्ततो युद्धं कुरूणामकरोन्महत् ।। ५३ ।। नृपश्रेष्ठ! सम्पूर्ण लोकोंके तत्त्वज्ञ तथा सर्वलोकेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने जब यह जान लिया कि आप सर्वथा सद्गुणशून्य हैं, अपने पुत्रोंपर पक्षपात रखते हैं, धर्मके विषयमें आपके मनमें दुविधा बनी हुई है, पाण्डवोंके प्रति आपके हृदयमें डाह है, आप उनके प्रति कुटिलतापूर्ण मनसूबे बाँधते रहते हैं और व्यर्थ ही आर्त मनुष्योंके समान बहुत-सी बातें बनाते हैं, तब उन्होंने कौरव-पाण्डवोंके महान् युद्धका आयोजन किया ।। ५१—५३ ।। आत्मापराधात् सुमहान् प्राप्तस्ते विपुलः क्षयः । नैनं दुर्योधने दोषं कर्तुमर्हसि मानद ।। ५४ ।। मानद! अपने ही अपराधसे आपके सामने यह महान् जनसंहार प्राप्त हुआ है। आपको यह सारा दोष दुर्योधनपर नहीं मढ़ना चाहिये ।। ५४ ।। न हि ते सुकृतं किंचिदादौ मध्ये च भारत । दृश्यते पृष्ठतश्चैव त्वन्मूलो हि पराजयः ।। ५५ ।। भारत! मुझे तो आगे, पीछे या बीचमें आपका कोई भी शुभ कर्म नहीं दिखायी देता। इस पराजयकी जड़ आप ही हैं ।। ५५ ।। तस्मादवस्थितो भूत्वा ज्ञात्वा लोकस्य निर्णयम् । शृणु युद्धं यथावृत्तं घोरं देवासुरोपमम् ।। ५६ ।। इसलिये स्थिर होकर और लोकके नियत स्वभावको जानकर देवासुर-संग्रामके समान भयंकर इस कौरव-पाण्डव-युद्धका यथार्थ वृत्तान्त सुनिये ।। ५६ ।। प्रविष्टे तव सैन्यं तु शैनेये सत्यविक्रमे । भीमसेनमुखाः पार्थाः प्रतियुर्वाहिनीं तव ।। ५७ ।। जब सत्यपराक्रमी सात्यकि कौरव-सेनामें प्रविष्ट हो गये, तब भीमसेन आदि कुन्तीकुमारोंने आपकी विशाल वाहिनीपर आक्रमण किया ।। ५७ ।। आगच्छतस्तान् सहसा क्रुद्धरूपान् सहानुगान् । दधारैको रणे पाण्डून् कृतवर्मा महारथः ।। ५८ ।। सेवकोंसहित कुपित होकर सहसा आक्रमण करनेवाले उन पाण्डववीरोंको रणक्षेत्रमें एकमात्र महारथी कृतवर्माने रोका ।। ५८ ।। यथोद्वृत्तं वारयते वेला वै सलिलार्णवम् । पाण्डुसैन्यं तथा संख्ये हार्दिक्यः समवारयत् ।। ५९ ।। जैसे उद्वेलित हुए महासागरको किनारेकी भूमि आगे बढ़नेसे रोकती है, उसी प्रकार युद्धस्थलमें कृतवर्माने पाण्डव-सेनाको रोक दिया ।। ५९ ।। तत्राद्भुतमपश्याम हार्दिक्यस्य पराक्रमम् । यदेनं सहिताः पार्था नातिचक्रमुराहवे ।। ६० ।।