महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 779, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपनी शक्तिको कटी हुई देख भीमसेनको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने बड़ी भारी टंकारध्वनि करनेवाले दूसरे वेगशाली धनुषको हाथमें लेकर समरांगणमें कुपित हो कृतवर्माका सामना किया ॥ ७५-७६ ॥ अथैनं पञ्चभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे । भीमो भीमबलो राजंस्तव दुर्मन्त्रितेन च ॥ ७७ ॥ राजन्! आपकी ही कुमन्त्रणासे वहाँ भयंकर बलशाली भीमसेनने कृतवर्माकी छातीमें पाँच बाण मारे ॥ ७७ ॥ भोजस्तु क्षतसर्वाङ्गो भीमसेनेन मारिष । रक्ताशोक इवोत्फुल्लो व्यभ्राजत रणाजिरे ॥ ७८ ॥ माननीय नरेश! भीमसेनने उन बाणोंद्वारा कृतवर्माके सम्पूर्ण अंगोंको क्षत-विक्षत कर दिया। वह रणांगणमें खूनसे लथपथ हो खिले हुए लाल फूलोंवाले अशोकवृक्षके समान सुशोभित होने लगा ॥ ७८ ॥ ततः क्रुद्धस्त्रिभिर्बाणैर्भीमसेनं हसन्निव । अभिहत्य दृढं युद्धे तान् सर्वान् प्रत्यविध्यत ॥ ७९ ॥ त्रिभिस्त्रिभिर्महेष्वासो यतमानान् महारथान् । तदनन्तर उस महाधनुर्धरने क्रोधमें भरकर हँसते हुए ही तीन बाणोंद्वारा भीमसेनको गहरी चोट पहुँचाकर युद्धमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले उन सभी महारथियोंको तीन-तीन बाणोंसे बींध डाला ॥ ७९ १/२ ॥ तेऽपि तं प्रत्यविध्यन्त सप्तभिः सप्तभिः शरैः ॥ ८० ॥ शिखण्डिनस्ततः क्रुद्धः क्षुरप्रेण महारथः । धनुश्चिच्छेद समरे प्रहसन्निव सात्वतः ॥ ८१ ॥ तब उन महारथियोंने भी कृतवर्माको सात-सात बाण मारे। उस समय क्रोधमें भरे हुए महारथी कृतवर्माने हँसते हुए ही समरांगणमें एक क्षुरप्रद्वारा शिखण्डीका धनुष काट डाला ॥ ८०-८१ ॥ शिखण्डी तु ततः क्रुद्धश्छिन्ने धनुषि सत्वरः । असिं जग्राह समरे शतचन्द्रं च भास्वरम् ॥ ८२ ॥ धनुष कट जानेपर शिखण्डीने तुरंत ही कुपित हो उस युद्धस्थलमें सौ चन्द्रमाओंके चिह्नसे युक्त चमकीली ढाल और तलवार हाथमें ले ली ॥ ८२ ॥ भ्रामयित्वा महच्चर्म चामीकरविभूषितम् । तमसिं प्रेषयामास कृतवर्मरथं प्रति ॥ ८३ ॥ उसने स्वर्णभूषित विशाल ढालको घुमाकर कृतवर्माके रथपर वह तलवार दे मारी ॥ ८३ ॥ स तस्य सशरं चापं छित्त्वा राजन् महानसिः ।