भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 805, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 805

सर्वे गणा भारत ये त्वदीयाः । सहस्रनेत्रप्रतिप्रभावं दिवीव सूर्य जलदव्यपाये ।। ५ ।। भारत! सात्यकिका पराक्रम असह्य था। उनका धैर्य और बल महान् था। वे इन्द्रके समान प्रभावशाली तथा आकाशमें प्रकाशित होनेवाले शरत्कालके सूर्यके समान प्रचण्ड तेजस्वी थे। आपके समस्त सैनिक मिलकर भी उन्हें रोक न सके ।। ५ ।। अमर्षपूर्णस्त्वतिचित्रयोधी शरासनी काञ्चनवर्मधारी । सुदर्शनः सात्यकिमापतन्तं न्यवारयद् राजवरः प्रसह्य ।। ६ ।। उस समय अत्यन्त विचित्र युद्ध करनेवाले, सुवर्ण-कवचधारी धनुर्धर नृपश्रेष्ठ सुदर्शनने अपनी ओर आते हुए सात्यकिको अमर्षमें भरकर बलपूर्वक रोका ।। ६ ।। तयोरभूद् भारत सम्प्रहारः सुदारुणस्तं समतिप्रशंसन् । योधास्त्वदीयाश्च हि सोमकाश्च वृत्रेन्द्रयोर्युद्धमिवामरौघाः ।। ७ ।। भारत! उन दोनों वीरोंमें बड़ा भयंकर संग्राम हुआ। जैसे देवगण वृत्रासुर और इन्द्रके युद्धकी गाथा गाते हैं, उसी प्रकार आपके योद्धाओं तथा सोमकोंने भी उन दोनोंके उस युद्धकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ।। ७ ।। शरैः सुतीक्ष्णैः शतशोऽभ्यविध्यत् सुदर्शनः सात्वतमुख्यमाजौ । अनागतानेव तु तान् पृषत्कां- श्छिच्छेद राजन् शिनिपुङ्गवोऽपि ।। ८ ।। राजन्! सुदर्शनने समरांगणमें सात्वतशिरोमणि सात्यकिपर सैकड़ों सुतीक्ष्ण बाणोंद्वारा प्रहार किया; परंतु शिनिप्रवर सात्यकिने उन बाणोंको अपने पास आनेसे पहले ही काट डाला ।। ८ ।। तथैव शक्रप्रतिमोऽपि सात्यकिः सुदर्शने यान् क्षिपति स्म सायकान् । द्विधा त्रिधा तानकरोत् सुदर्शनः शरोत्तमैः स्यन्दनवर्यमास्थितः ।। ९ ।। इसी प्रकार इन्द्रके समान पराक्रमी सात्यकि भी सुदर्शनपर जिन-जिन बाणोंका प्रहार करते थे, श्रेष्ठ रथपर बैठे हुए सुदर्शन भी अपने उत्तम बाणोंद्वारा उन सबके दो-दो तीन-तीन टुकड़े कर देते थे ।। ९ ।।