भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 812

दंशिताः क्रूरकर्माणः काम्बोजा युद्धदुर्मदाः । शरबाणासनधरा यवनाश्च प्रहारिणः ॥ १४ ॥ शकाः किराता दरदा बर्बरास्ताम्रलिप्तकाः । अन्ये च बहवो म्लेच्छा विविधाtokenपाणयः ॥ १५ ॥ -> wait, let me write standard devanagari correctly: विविधायुधपाणयः ॥ १५ ॥ यत्रैते सतलत्राणाः सुयोधनपुरोगमाः । मामेवाभिमुखाः सर्वे तिष्ठन्ति समरार्थिनः ॥ १६ ॥ ‘जहाँ कवच धारण किये रणदुर्मद क्रूरकर्मा काम्बोज, धनुष-बाण धारण किये प्रहारकुशल यवन, शक, किरात, दरद, बर्बर, ताम्रलिप्त तथा हाथोंमें भाँति-भाँतिके आयुध धारण किये अन्य बहुत-से म्लेच्छ—ये सब-के-सब जहाँ दुर्योधनको अगुआ बनाकर दस्ताने पहने युद्धकी इच्छासे मेरी ओर मुँह करके खड़े हैं, वहीं चलो ।। १४—१६ ।। एतान् सरथनागाश्वान् निहत्याजौ सपत्तिनः । इदं दुर्गं महाघोरं तीर्णमेवोपधारय ॥ १७ ॥ ‘इन सबको युद्धस्थलमें रथ, हाथी, घोड़े और पैदलोंसहित मार लेनेपर निश्चितरूपसे समझ लो कि हमलोग इस अत्यन्त भयंकर दुर्गम संकटसे पार हो गये’ ।। १७ ।।

सूत उवाच न सम्भ्रमो मे वार्ष्णेय विद्यते सत्यविक्रम । यद्यपि स्यात् तव क्रुद्धो जामदग्न्योऽग्रतः स्थितः ॥ १८ ॥ सारथिने कहा—सत्यपराक्रमी वृष्णिनन्दन! आपके सामने क्रोधमें भरे हुए जमदग्निनन्दन परशुराम भी खड़े हो जायँ तो मुझे भय नहीं होगा ।। १८ ।। द्रोणो वा रथिनां श्रेष्ठः कृपो मद्रेश्वरोऽपि वा । तथापि सम्भ्रमो न स्यात् त्वामाश्रित्य महाभुज ॥ १९ ॥ महाबाहो! रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य, कृपाचार्य अथवा मद्रराज शल्य ही क्यों न खड़े हों, तथापि आपके आश्रित रहकर मुझे कदापि भय नहीं हो सकता ।। १९ ।। त्वया सुबहवो युद्धे निर्जिताः शत्रुसूदन । दंशिताः क्रूरकर्माणः काम्बोजा युद्धदुर्मदाः ॥ २० ॥ शरबाणासनधरा यवनाश्च प्रहारिणः । शकाः किराता दरदा बर्बरास्ताम्रलिप्तकाः ॥ २१ ॥ अन्ये च बहवो म्लेच्छा विविधायुधपाणयः । न च मे सम्भ्रमः कश्चिद् भूतपूर्वः कथंचन ॥ २२ ॥ किमुतैतत् समासाद्य धीरसंयुगगोष्पदम् । आयुष्मन् कतरेण त्वां प्रापयामि धनंजयम् ॥ २३ ॥